अखबार

रचनाकार- राजन सिंह 

अखबार छपे दिन रात पढ़ें

इश्तिहार लगे खुबसूरत से।।

पढ़ते सब बैठ गये हुक्मरां

मरते न अभी सब यूँ हिं जवां।।

सुकुमा निहितार्थ रहे सहमी

नर के सिर काट दिये अहमी।।

बढ़ पाप रहे सह आप रहे

संग साथ नहीं नित जाप करे।।

अब पाक करे मन की दुश्मनी

जब चीन करे करनी अपनी।।

गजटों छपता बजटे खुब ये

फिर क्यों इतिहास नहीं छपते।।

स्तम्भ चार बना संविधान रहा

समझे अब वो अखबार कहाँ।।

चुगली करती इसकी उसकी

अब क्यों न लिखे हित देशज की।।

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