अच्छी पुलिस- बुरी पुलिस

रचनाकार- किशोर सिंह, दिल्ली 

हाईवे के किनारे बसे कसबे की उस चाय की दुकान पर अक्सर ही उन लोगों का जमावड़ा लगा रहता था जो कहीं की बात कहीं ले उड़ने में माहिर थेI ऐसे ही लोगों में शामिल सुरेश कुमार और रामफल बाबू चाय पीने के साथ ही साथ दुनिया भर की गप्पें भी मार रहे थेI अचानक  जाने कैसे बातों का सिलसिला पुलिस की कार्यप्रणाली की तरफ़ घूम गयाI

सुरेश कुमार का इस बारे में साफ़ विचार था कि पुलिस जनता की जगह, सरकार की मदद करने के लिए बनी होती हैI

रामफल बाबू ने चाय की चुस्की भरते हुए उन्हें अपने विचार सिद्ध करने को कहाI

“अब देखिये ना…” सुरेश कुमार शुरू हो गए “सुना है कि अभी कुछ दिन पहले ही पुलिस ने किसानों के एक आन्दोलन में शामिल लोगों पर गोलियां चला दीI इतने सारे निर्दोष लोग मर गए, जाने कितने घायल हो गए…पुलिस का क्या गया!  लेकिन जिसके घर के लोग मर गए उनकी सुध लेने वाला कौन है?”

“सरकार ने उन लोगों के घर वालों को मुआवजा देने की बात तो कही है”

“मुआवजा तो अपनी जगह है…लेकिन पुलिस का अपना भी तो कोई विवेक होता है या नहीं ?” सुरेश कुमार ने तमककर पूछाI

“होता है भाई, होता है…लेकिन सुना है भीड़ ने थाना ही घेर लिया था फूंकने के लिए…तुम्हे पता भी है कितना दबाव होता है पुलिस पर?”

“अरे ये सब तो कहने की बातें हैं…पुलिस को तो जनता को सताने का बस बहाना चाहिए होता हैI देखते नहीं है आप…कहीं भी चौराहे पर चेकिंग के नाम पर रोक लिया…कागज के नाम पर वसूली, चालान, रिश्वतखोरी, भ्रष्टाचार… क्या कमी नहीं है पुलिस में?”

“सुरेश भाई…यह सब समस्याएँ तो भारत के हर विभाग में हैं”

यह सब बातें चल ही रही थी कि अचानक धड़ाम की आवाज आयीI दुकान में बैठे सभी लोग भाग कर सड़क पर आयेI थोड़ी ही दूर पर एक बस और एक कार आपस में भिड़ी हुई दिख रही थीI दूसरे लेन पर हो रही मरम्मत की वजह से आने जाने वाली गाड़ियाँ कल से एक ही लेन से हो कर गुजर रही थींI

टक्कर इतनी जोरदार थी कि कार एक साइड से पूरी तरह पिचक गयी थीI बस में बैठे लोग सुरक्षित थे लेकिन कार में बैठे लगभग सभी लोग ऑन स्पॉट मर गए थेI उनके कटे हुए हाथ-पैर इधर उधर छितराए पड़े थेI कार के अन्दर केवल एक व्यक्ति के जीवित होने का एहसास बस उसके धीरे धीरे हिलते हुए हाथों से ही हो रहा थाI

भीड़ कार के चारों तरफ घेरा बनाकर खड़ी थी लेकिन भीड़ में कोई भी आगे बढ़कर कार के अन्दर से उस आदमी को निकालने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा थाI

किसी ने पुलिस को फ़ोन कर दिया, जिसके जबाब में थोड़ी ही देर बाद पुलिस की जीप वहां पहुँच गयीI

जीप से उतरे सब इंस्पेक्टर ने वहीं खड़े ग्रामीणों में से एक से गमछा मांगकर बिखरे मानव अंगों को उस गमछे में समेटना शुरू किया और बाकी पुलिसकर्मी कार के चारो तरफ बन गए खून के तालाब में पाँव रखने से बचते हुए कार के अन्दर से उस घायल को निकालने में जुट गएI

थोड़ी ही देर में एम्बुलेंस भी आ गयीI

“तुम तो कह रहे थे…” रामफल बाबू ने सुरेश कुमार से कहा “कि पुलिस सिर्फ जनता को सताना जानती है!”

सुरेश कुमार और बाकी कुछ लोग फ़ौरन भीड़ से छंट गएI

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