कहानी राहुल की

रचनाकार- आलोक बंसल

(आलोक बंसल शिक्षा विभाग से जुड़े हुए हैं और समाज से जुड़े मुद्दों पर मर्मस्पर्शी लेख लिखते हैं) 

“राहुल काम क्यों नहीं किया आपने?”

“सर! मेरे पास कॉपी नहीं थी।”

“कॉपी नहीं है तो ले कर क्यों नहीं आता?”

“सर! मेरी मम्मी दिलाती नहीं है।”

“क्यों? क्या दिक्कत है?”

“सर! हमारे पास पैसे नहीं है। हम बहुत गरीब हैं। मेरा पापा काम पर नहीं जाता है, सारा दिन नशा करके घर पड़ा रहता है। मेरी मम्मी को मारता है और सारे पैसे भी छीन लेता है, ना दे तो गालियां निकलता है और हमें भी पीटता है।”

“जा बैठ जा बेटा…कल अपनी मम्मी को स्कूल में बुलाकर लाना।”

“सर! आपने बुलाया था? क्या काम था?”

“बहनजी, आप राहुल को कॉपी-पेंसिल नहीं देते हो ऐसे ये पढ़ेगा कैसे?”

“मास्टर जी!! पढ़ेगा तो पढ़ लेगा पर क्लेश से तो बचा रहेगा। नहीं तो इनका बाप घर पर यूँ ही मार देगा इनको। उसे औलाद-बीवी, पढाई-लिखाई, रोटी-कपड़े, कॉपी-पेंसिल किसी चीज़ की कोई चिंता नहीं, कोई जरुरत नहीं है। बस…एक नशा चाहिये…उसके लिए कुछ भी करने को तैयार है। बीवी कहीं जाए…कैसे ही लाए कोई मतलब नहीं, बस नशा करने को पैसे ला दे नहीं तो मारपीट करेगा…गालियां निकालेगा,घर का कोई भी सामान बेच देगा। आप ही बताओ मास्टरजी दो टाइम की रोटी खिलाऊँ या कॉपी-पेंसिल दिलाऊँ? पहले काम पर जाता था तो अपने लायक तो कमा लेता था, अब तो नशे में इतना खत्म हो लिया कि घर ही पड़ा रहता है। नशा ना मिले तो इतनी बुरी तरह से तडफ़ता है कि देखा ना जाता। डॉक्टर कहता है यही हाल रहा तो थोड़े दिन ही निकालेगा….मास्टरजी अभी तो काम करके खिला रही हूँ। यही हाल रहा तो शरीर भी बेचना पड़ेगा..इसकी दवाइयों के लिए।”

मैं सकते में था।

सोच रहा था कि एक 30 साल का युवक गल रहा है लाचार…निरीह…मज़बूर…पल-पल, तिल-तिल मौत की ओर बढ़ रहा है…एक अज्ञानतावश की गई गलती को जान की कीमत से चुकाएगा।

मै सोच रहा था एक 30 साल की युवती के बारे में जो ना जाने किस की गलती को भुगत रही थी। पल-पल, तिल-तिल तडफ़ना जिसकी नियति बन चुका है। जो कभी अपने पति को जिस के साथ एक सुखी जीवन जीने के सपने बुनती अपने पिया के घर से ढ़ोल-नगाड़ों सी ख़ुशी में आई थी और आज एक वेदना की तुरही बन रह गयी है को देखती है तो कभी भूख से बिलखते मासूम बच्चों को देखती है। जिसके लिए इज़्ज़त-आबरू, संस्कार-शिक्षा, संतान-भविष्य, बुर्का-दुपट्टा सब गौण है। वर्तमान की दो जून की रोटी ही सब कुछ हो चुकी है। जो बिना कोई बीमारी के ही लाइलाज बन चुकी है..हार चुकी है जीवन से और पल-प्रतिपल ना चाहते हुए भी आत्महत्या-सी मौत की ओर अग्रसर है।

मैं सोच रहा हूँ उस निर्बोध, मासूम,बालमन के विषय में जिसने जिंदगी का ककहरा पढ़ने से पहले ही नशा, भूख, गरीबी, मारपीट, गाली-गलौज़ को पढ़ लिया है। जो पल-पल अपनी अबोध आँखों के सामने तडफ़-तडफ़ कर नशे से मरते अपने बाप को देख रहा है। समाज में दो जून की रोटी के लिए मारी-मारी फिरती अपनी माँ को देख रहा है..जिसकी पढाई, शिक्षा-संस्कार, भविष्य की चिंता किसी को नहीं है। वो किस रास्ते की ओर बढ़ रहा है इसके लिए सोचने वाला कोई नहीं है। कोई फिक्रमंद नहीं है कि वो चोरी कर रहा है… लूटमार कर रहा है…गलत सोहबत में पढ़ रहा है…नशा बेच रहा है…नशा कर रहा है…नाश कर रहा है…एक बालक अपने जीवन का,अपने परिवार का, अपने अपनों का सर्वनाश कर रहा है

एक राहुल फिर बढ़ रहा है गुमराह हो पतन की डगर पर।

देश डूब रहा है,युवा डूब रहा है…और सोचने वाले अगले चुनाव को जीतने के लिए सोच रहे हैं।

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