सच का साहित्य- कितना ‘यथार्थ’ होना चाहिए साहित्य में?

रचनाकार- सिद्धार्थ अरोरा ‘सहर’ , दिल्ली 

(सिद्धार्थ उभरते हुए युवा लेखक हैं और किस्सों को अपने अलग, ख़ास दिल्ली वाले अंदाज में लिखने के लिए जाने जाते हैं)

साहित्य सिनेमा से बहुत पुराना है,… सिनेमा साहित्य से कहीं आगे है।

आर्ट फिल्म्स का अपना ही कल्चर है, अपनी ख़ूबसूरती है। आर्ट फिल्म के पास सबकुछ है सिवाए दर्शकों के। इसी तरह पल्प फिक्शन की कभी इज़्ज़त भले न की गयी हो पर, रीडर्स हमेशा मिले हैं।

इसकी वजह क्या है?

इसकी वजह है यथार्थ की पोटली। साहित्यकारों का मानना है कि वो क्योंकि ‘सच’ लिखते हैं, यथार्थ दर्शाते हैं इसलिए, और ये दुनिया क्योंकि सच से भागती है इसलिए, साहित्यिक किताबों की बिक्री ‘थोड़ी’ कम है। जबकि सलीम-जावेद की लिखी तकरीबन कहानियों में नायक अंत-पंत बुराई की बैंड बजा ही देता है (भले ही खुद भी शहीद हो जाए) ये बिलकुल सच है। साथ ही ये भी सच है कि हमारा मन रोज़ ऐसे सच को झेलता है इसलिए हम ‘मनोरंजन’ के नाम पर कभी ‘सिर्फ’ कला को तरजीह नहीं देते।

पर मेरे पास एक बड़ा सा सवाल है।

क्या सचमुच साहित्यकार ‘सच’ लिखते हैं?

क्या वाकई उनकी कहानियों में कल्पना का कोई अंश नहीं? छोटी-मोटी बात नहीं करते, सीधे पितामह को पकड़ते हैं। एक वक़्त था जब जमीदारों ने ‘चरस’ बोई हुई थी। मायने जीना दुश्वार किया हुआ था। किसान अपनी ही काटी फ़सल का हकदार नहीं रहता था। ये सच है। पर क्या वाकई कोई ‘होरी’ था भूखा मर गया? क्या वाकई कोई ‘धनिया’ थी जो अपने ही पति से सही बात के लिए भी जूते खाती थी? क्या वाकई कोई मिस्टर मेहता करके कोई दार्शनिक था जो अपना ही दर्शन भूल गया? नहीं न? ये काल्पनिक थे कि नहीं? अब पहला जवाब यही आएगा कि ऐसे बहुतेरे होरी और धनिया कुचले गए थे, तुम्हें कुछ पता भी है। मेरा सवाल अब फिर बजेगा, क्या ‘ये चरित्र थे?’ सच्चा जवाब है कि नहीं थे।

अब जिसके रचियता आप हैं, उसे अगर आखिर में किसी तरह गाय मिल जाती तो आपका क्या चला जाता? अगर धनिया की औलाद गोबर, आखिर में शहर से पैसा कमा कर अपने बाप के मरने से पहले उसे एक रात ही सही, चैन की नींद सो लेने देता तो आपका नाम कैसे कम हो जाता? इसका फर्क ये पड़ता कि जब हम ‘गोदान’ खत्म करते तब हमारे चहरे पर मुस्कान होती। हमें हौसला होता कि नहीं, कहीं किसी कोने में ही सही, खुदा है। और कल्पना अगर बिलकुल नहीं है तो राय साहब (शायद यही नाम है जमीदार का) को अंत-पन्त निरास्त्र क्यों कर दिया? सुख तो उन्हें भी नहीं मिला न? क्यों नहीं मिला? क्योंकि आप ऐसा चाहते नहीं थे मुंशी जी। आप ये भी दिखाना चाहते थे कि बुरा करोगे तो भुगतना भी पड़ेगा लेकिन भला करोगे तो थोड़ा ही सही भला भी होगा, आपसे लिखा न गया। आखिरी बात, रो तो रहे ही हैं हम, सच दिखाना, लिखना, हर लेखक का कर्तव्य होना चाहिए। पर अगर वो कल्पना की उड़ान उड़ ही चुका है तो क्लाइमेक्स में छोटी ही सही मुस्कान देने की कोशिश करे.. बाकी रो तो रहे ही हैं।

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