किसान का कर्ज

रचनाकार- विनोद कुमार दवे, पाली- राजस्थान. 

चौदह साल पहले की मार्च की वो दोपहर गणेश कभी नहीं भूल सकता…

आज के अखबार में एक फोटो गणेश का भी है। चौदह साल पहले इसी अखबार के किसी कोने में उसके बाउजी का फोटो छपा था। वह पाँचवीं कक्षा में पढ़ता था और एक उजड्ड से अधेड़ ने उसे एक मनहूस ख़बर इस तरह सुनाई जैसे सबसे पहले बताने की एवज में उसे कोई बड़ा पुरस्कार मिलने वाला हो। वह सरकारी स्कूल में नीम के पेड़ के नीचे अपने दोस्तों के साथ मटरगश्ती कर रहा था। मास्साब खाट पर औंधे मुंह सोये हुए थे। रात को खेत में काम के बाद उनमें इतनी भी हिम्मत नहीं बची थी कि अपना पोपला मुंह खोल कर बच्चों को चुप रहने के लिए भी कह सके। कुछ बच्चे मारदड़ी खेल रहे थे। दो तीन लड़के नीम के पेड़ पर बंदरों की तरह लटके हुए थे, आते जाते लोगों को टुकुर टुकुर ताकते हुए। एक दल कबड्डी खेलने में व्यस्त था। गरीबी पैबंद से झांक रही थी। तुरपाई भी इस कदर बिखर चुकी थी कि फिर से पैबंद लगाना शायद ही संभव होता। विद्यालय भवन के नाम पर सिर्फ एक कमरा था जो टूटे कुर्सी टेबल और फटे हुए रजिस्टरों से भरा हुआ था। लड़कियों के पढ़ने पर एक अघोषित प्रतिबंध लगा हुआ था। लड़कियां उपले थापते हुए ललचाई नजरों से लड़कों को स्लेट पर पट्टी पेन घिसते हुए देखती रहती। लड़कियों का समूह जब गोबर डालने उकल्डी पर जाता हुआ दिखता, लड़के उन्हें चिढ़ाया करते। अधिकतर बच्चे किसानों और मजदूरों के थे। इस छोटे से गांव में किसानों और मजदूरों में कोई खास फर्क नहीं रह गया था। किसानी मजदूरी में बदल गई थी। सूदखोर महाजन के चक्कर में अधिकतर किसान अपनी काफी जमीन खो चुके थे। ख़ुद के खेत में ही मजदूरी करते किसान बस महाजन का घर भर रहे थे। दुई टेम खाने को मिल जाए, वो भी बहुत बड़ी बात थी। चढ़ते ब्याज ने कइयों को बंधुआ मजदूर बनाकर छोड़ा था। पीढ़ियाँ खप गई थी ब्याज चुकाते-चुकाते, मगर सुरसा के मुंह की भांति महाजन की तिजोरी का मुख भी फैलता ही जा रहा था। इस छोटे से गांव में सिर्फ महाजन के घर में टीवी था, जिसकी एक झलक देखकर ब्याज चुकाने गए व्यक्ति के कलेजे को पता नहीं कैसे जरा सी ठंडक मिल जाती थी। कुछ लोगों के पास रेडियो जरूर था जिसकी आवाज़ गाहे बगाहे फ़िज़ा में गूंजती रहती।

और ऐसी ही एक दोपहर, जब विविध भारती से कोई अल्हड़ सा गाना हवा में तैर रहा था, वो अधेड़ शख़्स बदहवास भागता हुआ आया और नीम के पेड़ से कई फ़ीट दूर खड़ा होकर अति उत्साह में अपनी भारी आवाज़ में चिल्लाया,” गणिया! थारे बापू तो फांसी खा ली।“

एक वो दिन था, एक आज का दिन है। माँ हाड़तोड़ मेहनत के कारण सूख कर लकड़ी की माफिक दुबली पड़ गई है। खेत का टुकड़ा भी महाजन की तिजोरी में जाता रहा। गणेश ने अपने पिता की मौत के बाद मजदूरी का दामन थामना चाहा, लेकिन दो दिन कमठे पर काम के पश्चात ही भयंकर बुखार ने उसकी नाजुक देह को जकड़ लिया। बुखार के सप्ताह भर बाद जब वो वापिस बिस्तर से उठा, एक अनजाने प्रण के साथ स्कूल की और चल पड़ा। विद्यालय प्रांगण में खड़े नीम के पेड़ ने उसके बाउजी की जगह ले ली और उसकी ठंडी छांव में किताबों के साथ एक ऐसा सफर शुरू हुआ जिसने उसे आज इस मुकाम पर लाकर खड़ा किया कि उसकी माँ ने घर-घर जाकर गुड़ बांटा और अखबार में छपा अस्पष्ट फ़ोटो सब को दिखाती रही। अनपढ़ लोग खबर पढ़ने में तो समर्थ थे नहीं, संदेह की निगाहों से फ़ोटो को देखते और सोचते पता नहीं गणिया ही है या कोई और। हो सकता है उसकी मां पगला गई हो।

उस दिन जब गणेश स्कूल में अपना थैला छोड़ बदहवास भागकर खेत में पहुंचा, उसके बाउजी पेड़ की डाल लटके हुए थे। कई रातों तक उसके सपनों में वो लाश झूलती रही। बाहर निकली हुई जीभ और आंखें भयावह प्रतीत हो रही थी। मल मूत्र से धोती भीगी हुई थी। सफेद अंगोछे से झूलता हुआ उनका शरीर गणेश कभी नहीं भूल पाया। बाउजी के पास जो थोड़ी बहुत जमीन थी वो महाजन के पास गिरवी पड़ी हुई थी। मूल तो दूर की बात थी, ब्याज भी चुका पाना उसके वश में नहीं रहा था। गणेश से बड़ी तीन लड़कियां थी जिनमें से दो की शादी अभी तीन माह पहले महाजन से लिये कर्जे से ही संभव हो पाई थी। एक लड़की और थी जिसने अभी कैशोर्य की दहलीज पर कदम रखा ही था कि महाजन के लड़के की नजर उस पर पड़ गई। खेत पर खाना देते जाते समय उस बच्ची के साथ जो कुछ हुआ, उसकी हिम्मत नहीं हो पाई किसी से कहने की। लेकिन रात को उसके पेट में जो असहनीय दर्द हुआ, उस दर्द के साथ-साथ पेट के भीतर गहरे तक धंसी हुई वह बात भी बाहर निकल आई। कर्ज़ के तले दबा हुआ बाप पागल हो उठा। आधी रात को ही गुस्से से तमतमाते हुए वह घर से निकल पड़ा, और सुबह उसकी लाश पेड़ से लटक रही थी। राम जाने उसके साथ क्या हुआ। कोई नहीं जान पाया गला दबाकर लटका दिया गया या उसने आत्महत्या कर दी थी। गणेश को पूरा विश्वास था उसके बाउजी इतने कमजोर नहीं थे कि फांसी खा ले।

उस मनहूस दिन के पश्चात महाजन के बेटे का घर आना जाना बढ़ गया। गणेश उस उमर में कुछ समझने के काबिल नहीं था। माँ मजदूरी में पड़ गई। खेत महाजन खा चुका था। महाजन के बेटे का बीज उस कमसिन किशोरी के पेट में पड़ गया। और लोक लाज के भय से उस लड़की ने मौत को गले लगा दिया। बहन के जाने के बाद गणेश पूरी तरह टूट चुका था लेकिन उसकी माँ ने स्वयं का पेट काटकर भी उसे पढ़ाना जारी रखा।

जैसे-जैसे समझ आती गई, गणेश ने दृढ़ निश्चय कर लिया कि महाजन के कर्ज़ के बोझ से वह अपनी माँ को मुक्त करा कर रहेगा। वह जानता था कर्ज़ से ज्यादा बोझ अशिक्षा का था। ब्याज का यह कुचक्र गणित की एक पहेली ही थी जिसे सुलझाने में उसकी न जाने कितनी पीढ़ियां खप गई होगी। उसने अपनी मेहनत जारी रखी। बारहवीं उत्तीर्ण करने के पश्चात मां ने बहुत कोशिश की कि वह शहर जाकर पढ़े किन्तु उसने गांव में रहकर प्राइवेट ही अपनी ग्रेजुएशन पूरी की। उसके साथ ही उसने प्रशासनिक सेवा में जाने की कमर कस ली थी। अपने पहले प्रयास में वह प्री एग्जाम भी पास नहीं कर पाया। किन्तु दूसरे प्रयास में उसने साक्षात्कार तक का सफर गिरते पड़ते तय कर ही लिया। असफलताओं का दौर जारी रहा। साक्षात्कार में उत्तीर्ण नहीं हो पाने के बाद भी उसने हिम्मत नहीं हारी। और तीसरे प्रयास में उसने वो कर दिखाया जिसकी इस छोटे से गांव में किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी।

भारतीय प्रशासनिक सेवा परीक्षा उत्तीर्ण करने से ज्यादा खुशी उसे अपनी माँ के चेहरे पर एक संतोष भरी मुस्कान देख लेने की थी। आज उसकी माँ महाजन की हवेली के बाहर से गर्व से मस्तक उठा कर गुजरी। गणेश खुश था, महाजन के सूद के चक्रव्यूह से जल्द ही वह अपनी माँ को निकाल लाएगा। साथ ही उसका एक संकल्प था, गांव में शिक्षा की एक अलख जगाने का ताकि कोई बेटा अपने बाउजी की लाश को खेत की मेढ़ पर पेड़ की डाल से झूलता हुआ नहीं देखे, ना ही किसी बहन को महाजन की तिजोरी में अपनी इज्जत गिरवी रखनी पड़े।

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