कुलच्छनी

रचनाकार-  सिद्धार्थ अरोड़ा ‘सहर’, दिल्ली 

(विषय- लज्जा और ज़रूरत) 

“रमा की तो आदत ई खराब है। जब देखो चिल्लाती रहे। कोई तमीज लाज सिखाई होती इसकी माँ ने तो चार लोगों में इज्जत होती इसकी। हुंह” झुमकी जो रमा की रिश्ते में ताई लगती थी, हैण्ड पाइप से कलसी भरते हुए बोली।

“हाउ, अऊर ओसे दुई साल छोटी छुटकी को देखो, ओ कितना कायदे से रहती है रानी बिटिया सी, नहीं दीदी?” कलसी को सिर पर रखने में मदद करती उस घर की मंझली बहु और झुमकी की देवरानी पायल ने याद दिलाना चाहा।

दोनों हैण्डपाइप से पानी भर के लाने के बहाने गपियाते रहते और सबसे छोटी देवरानी  ‘कंगना’ जो ‘अपने खसम को खा गई थी’ को लानतें दिया करते। इन दिनों उनकी वार्ता का केंद्र रमा बन गयी थी क्योंकि वो लड़कों की तरह जिरह करने लगी थी।

झुमकी का लड़का रमा के बराबर होने के बावजूद उससे दबता था और ये बात झुमकी को बहुत खलती थी। तीनों बहुओं के आते ही तीन बिलकुल सटे हुए घर बनवा दिए गए थे। उस कस्बे में एक यही परिवार था जो साथ होते हुए भी अलग रहता था।

पायल निहायत दर्जे की सीधी थी, सिर्फ झुमकी की हाँ में हाँ मिलाया करती थी।

इसलिए पायक के मुँह से आज छुटकी की तारीफ सुनते ही झुमकी फट पड़ी “अरी चुप कर अब, काहे की रानी बिटिया, कुतिया है एक नंबर की, चार किताबें पढ़ ली तो खुद को मास्टरनी समझ बैठी।”

“लेकिन दीदी……”झुमकी ने टोका

“अरी तोहे पता ही का है अभी? मेरा जगन सारा दिन उसई घर पड़ा रहता है। कहता है छुटकी पढ़ा देती है।”

“तो का हुआ दी?” वो घर के बहुत करीब पहुँच गए।

“अरे हम पूछे तू काहे पढ़ाती है तो साफ़ नाट गयी। बोली न ताई, मैं न पढ़ाती…..”

“पर दीदी…..” पायल ने मुँह खोला ही था घर के आगे भीड़ लगी देख झुमकी दौड़ पड़ी।

चार लोग मिल के रमा को पकड़ने की कोशिश कर रहे थे पर वो सतरह साल की बालिका किसी के काबू में नहीं आ रही थी। “हट जाओ अम्मा आज हम राख कर देंगे इसको” तीसरी बार रमा के मुँह से निकले शोला उगलते शब्दों से तंग आकर कंगना ने फिर एक झापड़ रमा को जड़ दिया।

“चुप कर जा कलमुही…. कुछ तो लिहाज कर हमारा” कंगना रोते-रोते बिनती करने लगी।

जगन मूर्छित पड़ा था, डाक्टरी इमदाद की उसे सख्त ज़रूरत थी। पायल और झुमकी ने पहुँचते ही हंगामा खड़ा कर दिया।

“कुलच्छनी पैदा की है तूने कंगना, कुलच्छनी…. इससे से तो भला होता ये पैदा होते ही दबा दी जाती”

“ये का कह रही हैं आप?” कंगना के दिल पर गाज गिरी।

“और नहीं तो का? नागिन कहीं की हमरे बेटे के पीछे ही पड़ गयी है, अरे कोई ईको अस्पताल ले जाओ रे” झुमकी विलाप करने लगी!

तब स्थिति जगन के बापू ने आकर संभाली।

“अंट-संट न बको झुमकी, बात बताओ हुआ का है? काहे इतना हल्ला किया हुआ है?” उनकी इस घर में क्या सारे गाँव में तूती बोलती थी।

“हम बताते हैं ताऊ जी, ए जगन छुटकी का जबरजस्ती मुंह चूम रहा था। ओ तो हमने देख लिया तो भागने लगा, हमने दिया खींच के एक, एक ठो गुम्मा भी मारे हम…”

“बस कर हरामजादी, जियादा जुबान न चला, तुझे कीड़े पड़ें” झुमकी की छाती पर सांप लोटने लगे

सारे मोहल्ले में सन्नाटा छा गया।

“हम कहे देते हैं ताई, हमारी छुटकी को कोई हाथ भी लगाएगा न तो हम उसका सर फोड़ देंगे हाँ”

“चुप करो रमा बेटी, तुम सही किए, इस नालायक तो ऐसा ही सबक सिखाना चाहिए था, पढ़ाई का बहाने बहिन पर हाथ डालता है, छी” तब तक जगन होश में लाया जा चुका था इसलिए अपने बाप की फटकार उसे साफ़ सुनाई दे रही थी। झुमकी ने जैसे ही कुछ कहने के लिए मुंह खोला तो जगन के बापू ने उन्हें घुड़क दिया।

आधे प्रहर में झगड़ा सुलटाकर जगन के बापू एक बार फिर नायक बन गए। जगन को एक महीना उसके मामा के यहाँ भेजने की सजा दी गयी जिसे जगन ने इनाम समझ के कबूल कर लिया।

तमाशा खत्म होते ही छुटकी ने खिड़की बंद की और ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी।

रमा ने वापस आकर छुटकी को दिलासा दी। उसका सिर अपनी गोद में लेकर उसे यकीन दिलाया कि अब कभी जगन उसे नहीं सताएगा।

उसी देर शाम खाना खा चुकने के बाद बरामदे में तुलसी के पौधे के पास जगन के बापू कंगना को नसीहत दे रहे थे “देखो बहु, रमा का गुस्सा बहुत हो रहा है, हर बार हम नहीं न बचा सकते, उसको काबू में रखा करो”

कंगना गर्दन झुकाए सिर्फ हाँ में सिर हिला सकी।

“बहरहाल, जब तक हम हैं तुम्हारा घर का इज्जत पर आंच नहीं आएगा, अब तो खुस हो न?” ये एक अजीब सवाल था जिसके जवाब में कंगना ने सहमते हुए सवाल किया “आप ऊ, जगन को कहिए न कि छुटकी को न तंग….”

“का बोली?” जगन के बापू की आवाज़ में अपमान गूंजा

“ज…जी… कुच्छो नाही”

“जियादा मुंह खुलवाने का जरूरत नहीं है, अपनी कुलच्छनी को संभालो, और हाँ, हम तुम्हार खातिर ही बीच बचाव किए थे, वर्ना ओ झुमकी ने आज रमा का टुकड़ा-टुकड़ा कर दिया होता। खैर, अपना वायदा तो न भूली हो,”

“….जी… नहीं”

“साबास” जगन के बापू की आवाज़ फिर सरल हुई “उपरली कोठरिया में रात का दूसरा पहर में पानी लेकर आ जाना” इतना कहके जगन के बापू चलते बने।

रमा आज छुटकी को गोद में लिटा कर चैन की नींद सो रही थी। उसे भ्रम था कि उसने घर की इज्ज़त बचा ली है। छुटकी नींद के लिए तरस रही थी, उसके पेट और पैर बहुत दर्द कर रहे थे।

सुबह सूर्योदय से ज़रा पहले कंगना अपने घर में घुस रही थी।

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