कॉनमैन – समीक्षा


समीक्षक गौरव कुमार निगम

पुस्तक नाम– कॉनमैन

लेखक– सुरेन्द्र मोहन पाठक

प्रकाशन – वेस्टलैंड प्रकाशन

विधा– उपन्यास

मूल्य-196 रुपये/- (ई बुक संस्करण भी उपलब्ध)

कथा सारांश

राजनगर में कियारा सोबती नामक महिला, खोजी पत्रकार सुनील कुमार चक्रवर्ती के दोस्त रमाकान्त के साथ उससे मिलने उसके ऑफिस में आती हैI वहां सुनील को उससे ज्ञात होता है कि कियारा एक पब्लिशिंग हाउस में एडिटर के तौर पर काम करती है और अभी हाल ही में वो अपने दिवंगत मामा की वसीयत के मुताबिक एक बड़ी रकम की मालकिन बनी थीI

लेकिन उसकी अमीरी के दिन थोड़े ही दिनों में हवा हो जाते हैंI

आदित्य खन्ना नामक एक व्यक्ति छह महीने पहले कियारा सोबती को ऑनलाइन, अपने प्रेमजाल में फंसाकर उसके मामा से मिली हुई दौलत झटककर गायब हो जाता हैI वह खुद को बोस्टन यूनिवर्सिटी का पढ़ा हुआ, न्यूयोर्क निवासी और वहीँ के एक बड़े बैंक में वाईस प्रेसिडेंट बताता हैI

कियारा के मुताबिक उसने उसी आदमी को कल शाम ही शहर के एक नामी फाइव स्टार होटल में अंशुल खुराना के नए नाम से ठहरा हुआ पाया था और उसे पक्का यकीन था कि वो वहां अपने नए शिकार को ठगने के लिए तैयार बैठा था मगर वह कियारा के सामने खुद को आदित्य खुराना मानने को तैयार नहीं था, और इस बार में किसी भी तरह की कोई बात करने लिए आज रात आने को कहता हैI

सुनील चक्रवर्ती कियारा को राय देता है कि एक बार उसे उस आदमी की बात सुनने के बाद अपना अगला कदम निर्धरित करना चाहिए. कियारा उस रात यूथ क्लब में पहुंचती है और सुनील को बताती है कि आदित्य/अंशुल ने उससे मुश्किल से एक मिनट ही बात की और उसे टरका दियाI कियारा का मानना था की उसके साथ शायद कोई और लड़की भी थी जिसे वो अपने जाल में फंसा रहा थाI

सुनील छानबीन करने के लिए रमाकान्त के सहयोगी जौहरी के साथ वापस आदित्य/अंशुल के होटल में जाता है और पाता है कि उसके पहुँचने के पहले ही किसी ने आदित्य/अंशुल के सीने में चाकू घोंपकर उसका खूनकर दिया हैI

लाश देखते ही सुनील के अन्दर बैठा खोजी पत्रकार एक्टिव हो जाता है और आगे की खोज में यह पता चलता है कि आदित्य/अंशुल एक प्रोफेशनल कॉनमैन था और उसका यह असली नाम भी नहीं थाI एक अरसे से वह राजनगर में लड़कियों को ऑनलाइन या सोशल मीडिया के माध्यम से अपनी लच्छेदार बातों में फंसकर ठग रहा थाI

दर्जनों लोग आदित्य की जान के दुश्मन हो सकते थे, यह पता चलते ही सुनील की प्रसिद्ध सुनीलियन सूंघ अपने जलाल पर आ जाती हैI

समीक्षा-

सुरेन्द्र मोहन पाठक जी की कलम सुनील सीरीज लिखते वक़्त अपने सबसे सहज रूप में चलती है. ‘कॉनमैन’ सुनील सीरीज का 122वां उपन्यास है जो कि अपने आप में ही एक बड़ी घटना है. इसके साथ एक और दिलचस्प बात है कि इस उपन्यास का अंग्रेजी संस्करण ‘Conman’ भी उन्होने खुद ही तैयार किया हैI

लेखकीय से शुरू करते हैंI

सुरेन्द्र मोहन पाठक जी के लिखे लेखकीय की भी अपनी अलग महिमा है और शायद ही किसी और लेखक का लेखकीय संकलित होकर अलग से प्रकाशित हुआ होI लेखकीय हमेशा की तरह दिलचस्प हैI लेखकीय में भारत और पाकिस्तान का एक ही दिन बंटवारा होने के बावजूद अलग अलग दिनों पर स्वतंत्रता दिवस मनाने की वजह के बारे में सवाल हैI जिसका सही जबाब यह है कि आज़ादी दोनों ही देशों को एक ही दिन, यानि १५ अगस्त को ही मिली थी लेकिन चूँकि लार्ड माउंटबेटन 14 अगस्त के दिन लाहौर में अंग्रेजी हुकूमत के प्रतिनिधि के तौर पर मोहम्मद अली जिन्ना को सत्ता हस्तांतरण के लिए मौजूद थे इसलिए ऐसा भ्रमवश मान लिया जाता है कि पाकिस्तान को आज़ादी एक दिन पहले, 14 अगस्त को मिली थीI

दरअसल शुरूआत के कुछ सालों तक पाकिस्तान का भी स्वतंत्रता दिवस पंद्रह अगस्त को ही मनाया जाता था लेकिन बाद में पाकिस्तानी सरकार को हमेशा की तरह भारत के नक़्शे कदम पर चलना गंवारा न हुआ और इसके लिए बाकायदा कैम्पेन चला कर पब्लिक के मन में 14 अगस्त की तारीख को पाकिस्तान की आज़ादी के दिन के तौर पर बैठा दिया गयाI इसकी दूसरी महत्त्वपूर्ण वजह यह भी थी कि 14 अगस्त, 1947 को रमजान का 27वां दिन पड़ रहा था जो कि इस्लामिक कैलेंडर में बहुत शुभ माना जाता हैI

सुनील सीरीज के उपन्यासों में रमाकान्त की मौजूदगी की वजह से भरपूर हास्य व्यंग रहता है जो की इस उपन्यास में भी मौजूद हैI कहानी ‘रोमांस स्कैम’ पर आधारित हैI पुराने ज़माने में ऐसे ठग महिला को अपने प्रेमजाम में फंसाकर घर से गहने कपडे लेकर भागने के लिए कहते थे और रास्ते में मौका पाकर माल पर हाथ साफ कर देते थेI यहाँ इसका आधुनिक संस्करण है जहाँ ठग ने ठगने के लिए आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल किया हैI आज के दौर में अपनी पहचान छुपाकर इस तरह की ठगी करना काफी आसान हो गया हैI

कहानी शुरू के आधे कलेवर तक एक समान गति से आगे बढती है और कहानी का तानाबाना कसा हुआ रहता हैI कहानी में कई लडकियों का ठगी का शिकार होना सुनील की खोज का दायरा बढ़ा देता है जिससे कातिल में बारे में जानना आसान नहीं रह जाताI कहानी में रमाकान्त के नशे में प्रलाप का एक लम्बा सीन है जो वैसे तो बेज़रूरत का लगता है लेकिन पढने वाले के पेट में हंसा हंसाकर बल डाल देता हैI

उपन्यास वैसे तो ठगी और तकनीक के मेल पर आधारित है पर ठगी का सिर्फ जिक्र है, उसे होते हुए नहीं दिखाया गया हैI ठगी होते हुए देखना पढने वाले को ज्यादा रोमांचित करताI उपन्यास के कुछ डायलॉग अचानक ही द्रवित कर सकते हैं, जैसे जिस लड़की के लिए सुनील जी जान लड़ाए पड़ा है वो उसे अभी चार दिन पहले जानता भी नहीं था और फिर भी तरफदारी के लिए टोके जाने पर कहता है कि “अगर तुम अपनी बहन की साइड ले सकते हो तो मैं भी अपनी बहन की साइड ले सकता हूँ”

कहानी का एक बड़ा हिस्सा आधुनिक तकनीक पर, सोशल मीडिया पर आधारित है लेकिन कहीं भी कियारा को आदित्य/अंशुल की प्रोफाइल से जुड़े बाकी लोगों को देखने, जानने की उत्सुकता नहीं होती जो कि सामान्य, स्त्रीसुलभ उत्सुकता से मेल नहीं खाता वरना फेक आईडी का राज आसानी से खुल सकता थाI इसके अलावा कातिल को खोजने के लिए सुनील के पुराने तौर तरीकों का ही इस्तेमाल किया गया है जबकि होटल के बाहर, आस पास की बिल्डिंग या दुकानों में लगे cctv की मदद से संदिग्धों की पड़ताल की जा सकती थीI आजकल कत्ल के मामले में पुलिस सबसे पहले मोबाइल लोकेशन तलाशती है जिसके मदद से यह साबित करना कि घटना के वक़्त कौन कहाँ था, काफी आसान काम हो गया हैI इसके ज़रिये भी इंस्पेक्टर प्रभुदयाल आराम से हर संदिग्ध की लोकेशन और टाइम का पता कर सकता था और संदिग्धों की पड़ताल का दायरा बहुत छोटा कर सकता थाI

उपन्यास अच्छा है और रमाकान्त के दीवानों को खासतौर पर पसंद आएगाI

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