जनप्रिय लेखक ओम प्रकाश शर्मा : अनुपम कृतित्व

रचनाकार-  श्री रमाकांत मिश्र

हिंदी जासूसी उपन्यासों के सूत्र बहुत दूर तक जाते हैं लेकिन अगर संस्कृत साहित्य को संज्ञान में न लिया जाये तो भी बाबू देवकीनंदन खत्री और उनके सुपुत्र बाबू दुर्गा प्रसाद खत्री के साथ-साथ श्री गोपाल राम गहमरी से प्रारम्भ होकर विभिन्न लेखकों से समृद्ध होते हुए स्वातंत्र्योत्तर भारत में एक खास लेखक के आगमन तक हिंदी जासूसी उपन्यास किसी विशिष्ट स्वरुप की तलाश में प्रतीत होता है.

ये लेखक कोई और नहीं जनप्रिय लेखक ओम प्रकाश शर्मा थे.

शर्मा जी के आगमन तक हिंदी जासूसी उपन्यासों में खत्री पिता-पुत्र के मौलिक लेखन की परम्परा को तिलांजलि देकर, नक़ल और अनुवाद का बाज़ार खड़ा किया जा चुका था. शर्मा जी ने अपने पहले उपन्यास से ही जैसे क्रांति कर दी. उनका कथानक तो मौलिक था ही, भाषाशैली, प्रस्तुति  और पात्र सभी मौलिक थे. उनका नायक राजेश एक आदर्शवादी युवक था जो केन्द्रीय खुफिया विभाग का होनहार जासूस था. उसका दृष्टिकोण मानवतावादी था और वह अपराधी को मारने या बंदी बनाने के स्थान पर उसे सुधरने का अवसर देने में विश्वास करता था. इस पात्र में एक ताज़गी थी. वस्तुतः ये एक विचारधारा थी जिससे आगे आने वाले बहुत से लेखकों ने प्रेरणा ली. इससे पूर्व ऐसे किसी पात्र की कल्पना नहीं की गयी थी. इस पात्र की लोकप्रियता के इतने किस्से हैं कि चकित रह जाना पड़ता है. न जाने कितने लोग इसे वास्तविक व्यक्ति समझते थे. कई बार शर्मा जी के पास ऐसे अनुरोध आये कि फलां क्षेत्र में अपराध की पड़ताल के लिए राजेश को भिजवाया जाये. यह शर्मा जी की लेखनी के चमत्कार के सिवा और क्या है? शर्मा जी ने राजेश के लिए एक संबोधन बड़े भाई प्रयोग किया जो कालांतर में सारे हिंदी क्षेत्र में एक बहुप्रचलित सम्मान सूचक शब्द बना.

अगर विचारों की नवीनता की ही बात करें तो जगन के रूप में रिश्वतखोर जासूस की कल्पना भी अभिनव ही थी.

एंटी हीरो का नाम तो बहुत बाद में आया लेकिन शर्मा जी ने इसकी कल्पना जगत के रूप में बहुत पहले ही कर ली थी. यह एक अहिंसावादी अंतर्राष्ट्रीय ठग है जो स्वभाव से लम्पट है लेकिन कभी किसी भली स्त्री के साथ अपनी शक्तियों का दुरूपयोग नहीं करता केवल यौनिक स्वच्छंदता का आचरण करने वाली स्त्री के साथ ही अग्रसर होता है. इस पात्र को लेकर शर्माजी ने सर्वाधिक उपन्यास लिखे. इसी पात्र के पूर्वजन्म पर शर्मा जी ने दो अनुपम उपन्यासों की रचना की – बेग़म गुलनार का प्रेमी तथा नीली घोड़ी का सवार.

विलक्षण प्रतिभाओं के धनी नायकों/ प्रतिनायकों यथा विलियम कृष्ण, प्रोफेसर गगन, भुवन आदि की कल्पना तो अद्भुत थी ही लेकिन इनसे मुकाबला करते एक आम आदमी जैसी क्षमता वाले नायक राजेश की कल्पना अनुपम थी. लेकिन इतना होने पर भी उन्होंने राजेश को मानवीय दुर्बलताओं से परे नहीं दिखाया है. अपनी पत्नी के प्रति वफादार होते हुए भी वह परस्त्री की ओर आकृष्ट होता है. वह अजेय नायक नहीं है. वह अनेक से पराजित होता है. यहाँ तक कि भुवन तो उसे पुलिस द्वारा ही कैद करा देता है.

राजेश एक ऐसा पात्र है जिसके लिए शर्मा जी आदरसूचक शब्द का प्रयोग करते हैं और क्या छोटे क्या बड़े सभी उसका सम्मान करते हैं. राजेश की पत्नी तारा राजेश स्त्री स्वाभिमान की प्रतीक है.

राजेश का सहयोगी जयंत है जो राजेश जितना ही योग्य है लेकिन अड़ियल स्वभाव का है. हीला हवाली के बिना किसी काम में हाथ डालना उसकी आदत नहीं.

जासूसों का काम रहा है घटना घटित हो जाने के उपरांत अपराधी का अन्वेषण करना. किन्तु अपराध होने से पूर्व ही उसकी सम्भावना को पहचान कर प्रमाणों के साथ संभावित अपराधी को अपराध करने से ही रोक देने के लिए केन्द्रीय खुफिया विभाग के अर्थात ईमानदार -३ अनुभाग की कल्पना और आभा, दीप और प्रभात के रूप में तीन नवीन पात्रों को केंद्र में रख कर उपन्यासों की रचना करना शर्मा जी के ही बूते की बात थी.

जगन का साथी बन्दूक सिंह तो है ही, केन्द्रीय खुफिया विभाग में ही कई अन्य पात्र भी प्रचलन में आये जैसे शशांक चक्रवर्ती, इरफ़ान, पचिया,नमिता,सरल और  छेपटी.

नवयुवक जासूस चेतन की जासूसी कुछ अलग ही थी, चेतन सीरीज में ट्रांसमीटर की खोज सहित  कई उल्लेखनीय उपन्यास हैं.

लेकिन केन्द्रीय खुफिया विभाग के ये जासूस सभी प्रकार के मामले तो नहीं निपटा सकते, इसलिए शर्मा जी ने अनेक अलग-अलग पात्रों की रचना की.

उन्होंने स्वतंत्रता पूर्व के राजे रजवाड़ों के काल की कहानियों के लिए अमर पात्र राय कृष्ण गोपाली की रचना की और उसे केंद्र में रखकर अनेक अदभुत कथानकों की सृष्टि की. गोपाली का सूत्र वाक्य – जितना बड़ा जूता होगा पॉलिश उतना ज्यादा लगेगी – बहुत लोकप्रिय हुआ. जब मामला अंतर्राष्ट्रीय स्तर का हुआ तो  गोपाली के साथ मिस्र के इमामुद्दीन उर्फ़ ताऊ – जिसे पलक झपकते मूछ बदल लेने में महारथ है और फ्रांस की जासूस लिलियन राविरा की तिकड़ी बनाई. इसमें समय–समय पर रूस के वागारोफ़ को भी शामिल किया गया.

निजी घटनाओ की तफ्तीश के लिए एक ओर खुर्राट बुजुर्ग प्राइवेट जासूस चक्रम की कल्पना की तो दूसरी ओर युवा कमल की. शिकारी जासूस माधव जी तो हैं ही. चक्रम के कुत्ते हवाबाज़ का तो कहना ही क्या.

शर्मा जी हिन्दी के जासूसी लेखन के वैतालिक और पितामह श्री बाबू देवकी नंदन खत्री जी से प्रभावित रहे हैं और श्रृद्धांजलि स्वरूप उन्होने खत्री जी के सर्वाधिक लोकप्रिय पात्र भूतनाथ को केंद्रीय पात्र बनाकर तीन – चार उपन्यासों की रचना की। शर्मा जी का भूतनाथ अलग भी है और मज़ेदार भी. किन्तु शर्माजी ने कहीं भी उसके तेवर और चरित्र में शिथिलता नहीं आने दी और राजेश तक से उसका सम्मान ही होता दिखाया. यही नहीं उन्होने अपने काल्पनिक केंद्रीय खुफिया विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों के आवास को भूतनाथ कालोनी का नाम दिया।

अगर हम उनके मध्य काल के भारत के पात्रों की चर्चा करें तो इससे भी उनके उस काल की सोच की गहरी पकड़ व्यक्त होती है। लखनवी जासूस के नायक चतुरी पाण्डे का भारत के नवोन्मेष की ओर पूर्ण समर्थन होने पर भी वे अवध के नवाब के प्रति अपने दायित्व को जिस प्रकार निभाते हैं इसका समन्वय  शर्मा जी के ही बूते की बात है। इस दृष्टि से खून की दस बूंदें के नायक गुलहसन की विवशता भी शर्मा जी की कुशल लेखनी से ही संभव था।

पात्रों की चर्चा से बाहर आकर अगर शर्मा जी के कथानकों की चर्चा करें तो एक अनुपम कथा संसार उद्घाटित होता है. विषय वस्तु के आधार पर इसे दो मुख्य धाराओं में विभाजित किया जा सकता है – जासूसी और सामाजिक. इन दोनो ही धाराओं को पुनः दो श्रेणियों में विभाजित करना होगा –वर्तमान और ऐतिहासिक.

प्रथमतः जासूसी की ही बात करते हैं – तो हम पाते हैं कि शर्मा जी के कथानक अपने समकालीनो से बहुत अलग हैं. उनके अपराधी भी इसी समाज से पनपते हैं. वे कोई विकृत मानसिक रोगी या अनोखे व्यवहार वाले नहीं होते बल्कि हमारे बीच रहने वाले सामान्य लोग ही होते हैं जो विभिन्न कारणों से अपराध की ओर उन्मुख हो जाते हैं. और इस प्रकार शर्माजी ने सामाजिक विसंगतियों, वर्ग मानसिकता और आर्थिक विवशताओं को रेखांकित ही नहीं किया वरन उनके समाधान की दिशा में सार्थक और व्यवहारिक सुझाव भी दिए. यही कारण है कि उनके जासूसी उपन्यासों में रहस्य से अधिक अन्वेषण पर जोर है. उन्होंने अपने काल की सभी आपराधिक समस्याओं को केंद्र में रखकर जासूसी उपन्यासों की रचना कि चाहे डाकू समस्या हो, प्राचीन मूर्तियों की तस्करी हो, सरकारी ठेकों में भ्रष्टाचार हो या फिर पॉकेट बुक व्यवसाय के गोरखधंधे ही क्यों न हों.

उन्होंने साहसिक अभियानों वाले उपन्यास भी लिखे जिनमें या तो किसी प्राकृतिक या मानव निर्मित रहस्य के उद्घाटन के लिए अथवा किसी वैज्ञानिक की मानवता विरोधी गतिविधियों के शमन हेतु नायको द्वारा साहसिक प्रयास किये जाते थे. दूसरे विश्वयुद्ध की पृष्ठभूमि पर लिखा टाइम बम एक ऐसा उपन्यास है जो हिंदी में दूसरा नहीं.

उनके उपन्यासों में वैज्ञानिक दृष्टि मिलती है और वैज्ञानिक आविष्कारों का पर्याप्त समावेश भी. इस दृष्टि से उनके उपन्यास समय से आगे के हैं. वे यहीं पर रुकते नहीं उन्होंने भारतीय योग, वशीकरण, ज्योतिष, तन्त्र, आदि विभिन्न भौतिक-आध्यात्मिक, पराभौतिक मान्यताओं को भी अपने उपन्यासों में स्थान दिया और प्रमाणिकता के साथ दिया. ऐसा इसलिए कि ये सभी हमारे मानस और मान्यताओं मं विद्यमान हैं. इस प्रकार शर्माजी अपने समकालीनो से ही नहीं बल्कि परवर्तियों से भी बहुत आगे हैं.

पराभौतिक श्रेणी में उनका गोपाली सीरीज का उपन्यास पिशाच सुंदरी अप्रतिम है. इस जोड़ का दूसरा उपन्यास किसी भारतीय लेखक द्वारा आज तक नहीं लिखा जा सका. डायन उपन्यास भी इसी श्रेणी का है.

शर्मा जी ने अपने युग की राजनीति पर जम कर कलम चलाई. राजनेताओं पर उनकी व्यंग्य दृष्टि रहती थी. राजनीति में व्याप्त भ्रष्टाचार और पूंजीपति, राजनीतिज्ञ और मीडिया के आपराधिक गठजोड़ पर उन्होंने एकाधिक उपन्यास लिखे- कलियुगी जासूस जगन गंगा की बाढ़ में, रंगकोट का रेस्ट हाउस, कफनचोर  आदि. अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति पर उनका भूतनाथ सीरीज का उपन्यास भूतनाथ की संसार यात्रा अपनी मिसाल आप है. अंतर्राष्ट्रीय जासूसी पर मानवतावादी दृष्टिकोण से लिखा उपन्यास ५४ की वापसी बेमिसाल है. भारतीय सरकारी कार्यालयों में व्याप्त चाटुकारिता आदि पर उनका उपन्यास सेक्शन . दृष्टव्य है. समसामयिक समस्याओं पर उनके अनेक उपन्यासों की भीड़ में बांग्लादेश के समस्या पर इधर रहमान उधर बेईमान और मेजर अली रजा की डायरी उल्लेखनीय हैं.

आधुनिक और ऐतिहासिक के बीच कहीं अपने स्थान की तलाश करता उनका रोमांचक उपन्यास वैरागी नाले का रहस्य ठगों की समस्या पर आधारित एक बेहतरीन क्लासिक उपन्यास है. इस उपन्यास में शर्मा जी के द्वारा प्रयुक्त संवाद –जब तबला बजे धीनधीन तब एकएक पर तीनतीन – तो लोकोक्ति बन गया.

अगर ऐतिहासिक जासूसी उपन्यासों की बात करते हैं तो हमें चकित रह जाना पड़ता है. क्योंकि जहाँ एक ओर दूसरे हिंदी जासूसी उपन्यासकार इस श्रेणी में लिखने का साहस भी न जुटा पाए वहीँ शर्मा जी ने दर्जन भर उपन्यास लिख डाले और वो भी विभिन्न कालों पर. मुग़ल काल के अंतिम दिनों और नादिर शाह के हमले पर उनका बहुचर्चित जासूसी उपन्यास खून की दस बूँदें मील का पत्थर है तो प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की पृष्ठभूमि पर रचित शैतान की कब्र मंत्रमुग्ध कर देता है. औरंगजेब की धार्मिक नीति पर प्रश्न खड़े करता उनका जासूसी उपन्यास पापी धर्मात्मा का कोई सानी नहीं और फिर महमूद गजनवी के आक्रमण पर उनके जासूसी उपन्यास गज़नी का सुल्तान  और तूफान फिर आया  तो अमर रचना कर्म हैं.  अकबर के काल पर गुलबदन और विद्रोही जागीरदार जैसे उपन्यास कोई क्या खाकर लिखेगा. रतिमंदिर का रहस्य तो उनकी ऐसी रचना है जिस पर कई लोगों ने लिखा लेकिन कोई उसे छू भी न सका.

जासूसी उपन्यास के लिए तो शर्मा जी विख्यात थे ही. उन्होंने हिंदी में जासूसी उपन्यासों की दशा और दिशा दोनों ही बदल दी. लेकिन उनका मन लगता था सामजिक उपन्यास लिखने में. उनके सामाजिक उपन्यास शेष सामाजिक उपन्यासकारों के उपन्यासों से सर्वथा भिन्न थे. इन उपन्यासों को किसी न किसी समस्या को लेकर उसके निवारणार्थ लिखा गया. इन उपन्यासों का सिरमौर है – अपना अपना प्यार. ये उपन्यास प्रतिभा पलायन पर है लेकिन उपन्यास समाज  में व्याप्त कदाचार, धन और यश लोलुपता, भारतीय संस्कृति और हमारी पहचान, देश की आवश्यकताओं और समस्याओं पर चर्चा के साथ साथ साहित्य और संगीत के विषय में भी एक चेतना जागृत करता है. इस उपन्यास ने न जाने कितनो की ऑंखें खोल दीं.

स्वातंत्रयोत्तर भारत में स्वास्थ्य सेवाओं की दयनीय स्थिति थी. भारत के डॉ अधिक धन और अवसर के लोभ में विदेशों में बस जाते थे. इस समस्या पर शर्मा जी ने अतुल्य रचना की है – अपने देश का अजनबी. अन्य बातों अलावा इस उपन्यास में लेखक ने नायक द्वारा नायिका के बलात्कार की घटना के माध्यम से भारत और पश्चिम की मान्यताओं, दोनों स्थानों की महिलाओं की मानसिकता के अंतर और भारतीय नारी की विवशताओं का अदभुत चित्रण किया है.

पांचवी बहू सास ससुर के प्रति उत्तर दायित्व को रेखांकित करता ऐसा उपन्यास है जिसे कोर्स में पढाये जाने की आवश्यकता है. वृद्धजनों के प्रति संवेदनशीलता और स्त्री अधिकारों के सही आकलन के लिए एक जिद्दी लड़की से बेह्तर कुछ भी नहीं. रुक जाओ निशा विधवा विवाह की वकालत करता है और विधवा की मानसिकता पर सामाजिक प्रभाव  और उसके शोषण को दर्शाता है तो मुरझाये फूल फिर खिले विधवा स्त्री से  उसके मायके और ससुराल में होते अमानवीय व्यवहार को रेखांकित करता है.

हिन्दू-मुस्लिम एकता और उस पर हो रही राजनीति पर एक सशक्त कृति है – एक रात का मेहमान. इस उपन्यास में पाकिस्तान से आये एक राजनीतिज्ञ के अपने भारत में रह रहे बड़े भाई के यहाँ मेहमान बन कर एक रात के लिए जाने पर हुए घटनाक्रम के माध्यम से देश की गंगा जमुनी संस्कृति को दर्शाया गया है. एक ऐसा मार्मिक उपन्यास जो भुलाये नहीं भूलता.

यौन शुचिता एक ऐसा विषय है जिसे भारत में स्त्रियों के सन्दर्भ में चरित्र कहा जाता है. शर्मा जी इसे चरित्र नहीं मानते. इसी शुचिता पर टिपण्णी करता मार्मिक उपन्यास है एक रात. नव विवाहित दुल्हन पति के लापता हो जाने पर सास से पूछती है – आप को तो पता होगा कि ये कहाँ गए हैं? सास कहती है – कौन माँ जान पाई है कि उसके बेटे जवान होने पर कहाँ जाते हैं? इस उपन्यास में विधवा सास का जैसा चरित शर्मा जी ने गढ़ा है, स्पृहणीय है.

शर्मा जी की व्यंग्यात्मक शैली के दर्शन तिरछी नज़र और ढोल की पोल में होते हैं तो हास्य का पुट धड़कने  में उजागर होता है. उन्होंने बच्चों के लिए भी कुछ उपन्यास लिखे जिनमे स्काउट कैंप में हंगामा उल्लेखनीय है.

उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा उन्हें साँझ हुई घर आये पर उपन्यास सम्राट की पदवी और  पुरस्कार प्रदान किया था. यह उपन्यास प्रेम के ऐसे रंग प्रस्तुत करता है कि पाठक चकित रह जाता है. कर्तव्य, प्रेम, निष्ठा और समर्पण का अन्यतम दस्तावेज है ये उपन्यास.

अपने ४५० के आसपास उपन्यासों में उन्होंने अदभुत वैविध्य प्रस्तुत  किया है. उनकी रचना साँझ का सूरज १८५७ के स्वाधीनता संग्राम का जीवंत दस्तावेज है तो कृष्ण भक्त नूरबाई  का जीवन चरित एक अदभुत गाथा है. प्रख्यात उर्दू शायर जनाब नजीर अकबराबादी के जीवन और कृतित्व पर सारगर्भित उपन्यास दूसरा ताजमहल  उनकी गवेषणा और साहित्यिक पकड़ का अतुल्य अभिलेख है.

शर्मा जी के लेखन की अगर सिलसिलेवार चर्चा की जाये तो पुस्तकों की श्रृंखला बन जाये. अतः ये संक्षिप्त आलेख अब उनकी कुछ अति विशिष्ट बातों का उल्लेख कर विराम लेगा.

सर्वोपरि बात तो ये कि शर्मा जी के लेखन के प्रशंसक तो लाखों में थे लेकिन लाखों में एक हिंदी साहित्य के मूर्धन्य उपन्यासकार स्वर्गीय श्री अमृत लाल नागर जी स्वयं शर्मा जी के प्रशंसक थे. मज़े की बात ये कि शर्मा जी स्वयं नागर जी के प्रशंसक थे.

शर्मा जी एवं नागर जी भाषा में अद्भुत साम्य मिलता है, यद्यपि शर्माजी की भाषा सरल, सहज और आमजन द्वारा प्रयोग की जाने वाली भाषा है तथापि उसमें नागर जी की लच्छेदार रसीली तरावट वाली भाषा का आभास और आनन्द मिलता है.

शर्मा जी मुख्यतः संवादात्मक शैली का प्रयोग करते हैं जो कि कथ्य को गत्यात्मकता प्रदान करती है और पाठक को बाँधने में सफल होती है.

शर्मा जी बांग्ला उपन्यासकार श्री शरतचंद्र और श्री बिमल मित्र से बहुत प्रभावित थे. शरत का प्रभाव तो उनके कई स्त्री पात्रों में परिलक्षित होता ही है उनके उपन्यासों का वातावरण यथा नदी का तट, नौका आदि का भी शर्मा जी के उपन्यासों में प्रचुर प्रयोग मिलता है. किन्तु उन्होंने उनके किसी उपन्यास कई नक़ल नहीं की. वे गुरुदेव रबिन्द्रनाथ टैगोर से भी प्रभावित थे. उनकी भारतीय शास्त्रीय संगीत में गहरी रूचि थी और वे कुमार गन्धर्व के गायन के घोर प्रशंसक थे.

यों तो शर्मा जी का पूरा चिंतन और लेखन ही न सिर्फ मौलिक है बल्कि अभिनव और प्रेरक है। किंतु अगर हम कुछ ऐसी विशेषताओं का लेखा-जोखा करें जो कि शर्मा जी ने या तो सर्वप्रथम प्रस्तुत की अथवा केवल उनके द्वारा ही प्रस्तुत की गई तो हम पाएंगे कि-

1- मध्य काल (मुस्लिम शासन काल) को पृष्ठ भूमि बनाकर केवल उन्होने ही जासूसी और गैरजासूसी उपन्यासों की रचना की जिसमें ”लखनवी जासूस”, ”खून की दस बूंदें”, ”नूरबाई”, ”नीली घोड़ी का सवार”, ”पापी धर्मात्मा”, ”दूसरा ताजमहल” उल्लेखनीय है।

2-यह भी सुनने में आया है कि उन्होने रामायण एवं महाभारत कालीन पात्रों को लेकर जासूसी उपन्यास लिखे।
3- भारत की समस्याओं पर जासूसी उपन्यास लिखे जिसमें जमाखोरी की समस्या पर ”कफन चोर”, बांगलादेश की समस्या पर ”इधर रहमान उधर बेईमान”, भारत से प्रतिभा पलायन की समस्या पर ”अपनाअपना प्यार”, भारत की मुस्लिम समस्याओं पर अनेक उपन्यास जिसमें ”एक रात का मेहमान” शामिल है, पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा लगाए गए आपातकाल पर ”एमरजैंसी” इत्यादि उल्लेखनीय है।

4- भारत के स्वतंत्र होने के उपरांत विभिन्न रियासतों, रजवाड़ों की पृष्ठ भूमि पर उनकी समस्याओं पर आधारित अनेक उपन्यास जिनमें ”नीली ज्योति का रहस्य”, ”पी कहां” इत्यादि अनेक उपन्यास। वस्तुतः इस विशेष विषय पर उन्होने एक नायक गोपाली की सृष्टि की।

5- विभिन्न सामाजिक कुरीतियों यथा दहेज, जाति पाति, छुआ छूत, बुजुर्गों की समस्या इत्यादि विषयों पर तथा भारत में पांव पसारती विभिन्न नवीन कुरीतियों पर सार्थक उपन्यास लिखे जिनमें ”एक जिद्दी लड़की”, ”नया संसार”, ”चित्रकार की प्रेमिका”, ”एक रात” इत्यादि उल्लेखनीय है।

6- अपराध के घटित होने के उपरांत अपराधी के अन्वेक्षण करने पर तो सभी लिखते हैं शर्मा जी ने भी लिखा किंतु अपराध घटित होने से पूर्व संभावित अपराध का पता लगाकर उसे रोकने के विषय पर हिन्दी में और सम्भवतः अंग्रेजी में भी कोई उपन्यास नहीं लिखा गया है।

7- शर्मा जी हिन्दी के जासूसी लेखन के वैतालिक और पितामह श्री बाबू देवकी नंदन खत्री जी से प्रभावित रहे हैं और श्रृद्धांजलि स्वरूप उन्होने खत्री जी के सर्वाधिक लोकप्रिय पात्र भूतनाथ को केंद्रीय पात्र बनाकर तीन – चार उपन्यासों की रचना की। यही नहीं उन्होने अपने काल्पनिक केंद्रीय खुफिया विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों के आवास को भूतनाथ कालोनी का नाम दिया।

8- यह शर्मा जी की ही विलक्षण सूझ है कि उन्होने भूतनाथ श्रृंखला के उपन्यासों में तथा अन्यत्र भी मुंशी सदासुख लाल के नाटक ”इंद्र सभा” के पात्रों और ”किस्सा तोता मैना” के पात्रों को भी बड़े रोचक ढंग से सम्मिलित किया है। उपर्युक्त 8 बिंदुओं में सम्मिलित नवीन सोच और अभिनव प्रस्तुति ही इस महान लेखक की लेखनी का लोहा मानने के लिए पर्याप्त है।

शर्मा जी का एक परिपक्व व्यक्तित्व था और वे सहज जीवन शैली में विश्वास करते थे. उनकी प्रसिद्धि का लाभ उठाकर अनेक प्रकाशक उनके नाम से जाली उपन्यास छापते रहे लेकिन वे उदार मन से उनको क्षमा करते रहे. यहाँ तक कि कई प्रकाशकों ने तो उन्हें ही मुकदमों में घसीट लिया. तथापि उनकी उदारता का लाभ उठा लोग नकली उपन्यास तो छापते ही रहे, बल्कि उनके पात्रों के साथ एक नवीन पात्र विक्रांत जोड़ दिया और मज़े की बात तो ये कि वह पात्र भी प्रसिद्द हो गया. लेकिन इन उपन्यासों के घटिया लेखन के कारण बदनामी शर्मा जी के मत्थे पड़ी. कई लोग आज भी विक्रांत सीरीज पढ़ कर कहते हैं कि शर्माजी कुछ खास नहीं. कई लोग शर्मा जी को पढ़ कर लेखक बने. उन्होंने अनेक नए लेखकों को प्रोत्साहन दिया. शर्मा जी के पात्रों के साथ विक्रांत को लेकर लिखने वाले कुमार कश्यप को अपने समय में पर्याप्त लोकप्रियता मिली.

शर्मा जी को हिंदी सिनेमा के अधिकांश निर्देशकों पर विश्वास नहीं था अतः अनेक प्रस्ताव मिलने पर भी उन्होंने अपनी पुस्तकों पर फिल्म बनाने की अनुमति नहीं दी लेकिन जब उनके प्रिय निर्देशक बासु चटर्जी के निर्देशन में फिल्म का प्रस्ताव मिला तो वे न नहीं कर सके और फलस्वरूप उनके उपन्यास धड़कने पर अनिल कपूर अभिनीत चमेली की शादी जैसी बेहतरीन फिल्म बन सकी.

शर्मा जी ने हिंदी लोकप्रिय साहित्य विशेषकर जासूसी साहित्य को अतुलनीय योगदान दिया. हिंदी के प्रचार प्रसार में उनकी भूमिका का आकलन होना अभी शेष है किन्तु भारत में उनके काल में आमजन की आय को देखते हुए और इसी के चलते  किराये पर उपन्यासों की सर्वत्र उपलब्धता के आलोक में उनके उपन्यासों के प्रथम संस्करण की प्रतियों की संख्या अकल्पनीय, अविश्वसनीय है.

कहा जाता है कि हिंदी में लिख कर कोई अपना घर नहीं चला सकता. किन्तु शर्मा जी ने इसे भ्रम सिद्ध किया. उन्होंने न सिर्फ लेखन से अपनी गृहस्थी चलायी बल्कि बहुत अच्छे से चलायी. अगर उनको हिंदी जासूसी साहित्य का प्रेमचंद कहा जाये तो कोई अतिश्योक्ति न होगी.

चित्र- साभार www.omprakashsharma.com। इस वेबसाइट पर करीब सवा सौ उपन्यास निःशुल्क ऑनलाइन वाचन हेतु  उपलब्ध हैं।

(श्री रमाकांत मिश्र जी ‘सिंह मर्डर केस’ जैसे चर्चित हिंदी उपन्यास के लेखक हैं और हिंदी साहित्य, खासकर हिदी पल्प फिक्शन कहे जाने वाले साहित्य के बारे में गहरी जानकारी रखते हैं)

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One comment on “जनप्रिय लेखक ओम प्रकाश शर्मा : अनुपम कृतित्व

  1. बेहतरीन लेख। लेख जनप्रिय लेखक ओम प्रकाश शर्मा जी की रचनाओं को पढ़ने के लिए लोगों को प्रेरित करेगा। ये दुखद है कि उनकी रचनायें अब प्रिंट नहीं होती, उम्मीद है इस लेख को पढ़ने के बाद इस दिशा में भी कदम उठेंगे। साइट में उपन्यास तो मौजूद हैं लेकिन उधर से पढ़ना सुविधाजनक नहीं होता है।
    हाँ लेख में एक वाक्य में मुझे थोड़ी से ग़लती दिखी:
    किन्तु उन्होंने उनके किसी उपन्यास कई नक़ल नहीं की.
    इधर ‘की’ को कई प्रकाशित करा गया है। अगर इसमें सुधार कर लें तो बढ़िया रहेगा।

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