पगली

रचनाकार- सविता मिश्रा, आगरा.

ऑटो-चालक ने नन्हें-नन्हें बच्चें भेड़-बकरी से ठूँस रखे थे ऑटो में। | पड़ोसी के बच्चे मुदित और उसकी नन्ही कली को भी डाल दिया था ऑटो में। तिल रखने की भी जगह न बची थी अब।

नन्हा मुदित बैठते ही पसीने-पसीने हो रहा था| परन्तु मधु का ध्यान ही न गया इस ओर कभी भी। सुबह चहकती हुई उसकी कली दोपहर की छुट्टी बाद मुरझाई सी घर पहुँची थी | वह खाना-पीना खिलाकर उसे बैठा लेती पढ़ाने | थकी हारी बच्ची रात में खा-पीकर जल्दी ही सो जाती थी।

एक दिन ऐसा आया कि ऑटो में ही कली मुरझा गयी| एक तो भीषण गर्मी, दूजे भेड़ बकरी से छोटे से ऑटो में ठूंसे हुए बच्चें।नन्हा मुदित भी बेहोश सा हो गया था|
बड़े-बड़े डाक्टरों के पास रोते बिलखते माता पिता पहुँचे थे, पर सब जगह से निराशा हाथ लगी थी उन्हें |

अपनी बच्ची को खोकर उसने सड़क पर अभियान सा छेड़ रखा था ! प्रतिदिन स्कूल के बाहर खड़े होकर उन ऑटो चालको को सख्त हिदायत देते देखी जाती थी, जो बच्चों को ठूँस -ठूँसकर भरे रहते थे| माता-पिता को भी पकड़-पकड़ समझाती थी। समझने वाले समझ जाते थे| पर अधिकतर लोग उसे पगली कह निकल जातें थे।

एसपी ट्रैफिक ने जब उसे बीच सड़क पर चलती ऑटो को रोकते हुए देखा, तो पहुँच गये थे उसे डांट लगाने| परन्तु उसका दर्द सुनकर, लग गयेे थे खुद ही इस नेक काम में |

आज मधु का सालों पहले छेड़ा अभियान रंग लाया था। ‘अधिक बच्चे बैठाने पर ऑटो चालकों को फाइन भरना पड़ेगा’ सुबह- सुबह आज के न्यूज़ पेपर में यह हेडिंग पढ़ मधु जैसे सच में पागल सी होकर हँसने लग पड़ी।

कानून के डर ने मधु के काम को बहुत ही आसान कर दिया था |
अब नन्हें-नन्हें फूल ऑटो से दोपहर में मुस्करातें लौटेंगे | सोचकर ही मधु मुस्कराकर सिर ऊपर उठा दो बूँद आँसू टपका दी! जैसे कि अपनी नन्हीं को श्रधांजलि दे रही हो।

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