पिता

रचनाकार- विशेष चन्द्र ‘नमन’, गिरिडीह- झारखंड

पुलिया पर बैठा भँवर, मुट्ठियों में रखें कंकड़ को नीचे बहते जल की पतली सी धारा में उछालते हुए यह सोंचता था कि किस प्रकार एक छोटा सा कंकड़ इस छिछली सी धारा में भी डूब गया और एक मेरा मन जो इतने सुख- दुःख – चिंताओं के भार के बावजूद अब तक हल्का ही रहा. जो कभी डुबाना चाहा भी तो अनायास ही उस गहराई के विरोध ने ऊपर धकेल दिया और यह सदा तैरता ही रहा.

जब भँवर का जन्म हुआ था, आषाढ़ अंत पर था, और लगातार पाँच दिनों की मूसलाधार बारिश ने गांव के तीन तरफ से बहने वाली नदी में बाढ़ ला दी थी, तथा पूरा गांव टापू में तब्दील हो गया था. ठीक उसी वक्त उसके दादा जी की तबीयत बिगड़ी, और वह अपने पोते का नामकरण (भँवर) कर दुनिया से विदा ले ली. और उसके बाद उसका जीवन भँवर ही बनकर रह गया.

भँवर अपने तीन भाइयों में मँझला था तथा दो बड़ी बहनें  भी थी. जन्म के ठीक बाद ही पिताजी की नौकरी गांव से करीब सौ किलोमीटर दूर देवघर शहर के एक कारखाने में बतौर मैनेजर लग गई. और वह सपरिवार वहीं चले गए. हर चार-पांच महीने में किसी खास तीज-त्यौहार में गांव आना हो जाता था. भँवर को गांव बहुत प्यारा था और वह हमेशा गांव जाने का इंतजार करता रहता .

पढ़ाई में कभी खासा लगाव रहा नहीं ; बस किसी तरह कक्षा में पास हो जाना ही मुनासिब समझता. अपने बड़े और छोटे दोनों भाइयों के साथ वह पास के ही एक प्रतिष्ठित विद्यालय में पढ़ता. पर छठी कक्षा में अनुत्तीर्ण हो जाने के कारण पिताजी ने उसका दाखिला वहीं एक सरकारी मिडिल स्कूल में करवा दिया जिसमें उसकी दोनों बहने भी पढ़ती थी.

मिडिल स्कूल में पढ़ते- पढ़ते, धीरे-धीरे उसकी पढ़ाई की ओर रूचि बढ़ने लगी. वह अपने अंग्रेजी के शिक्षक गोपाल सर से खासा प्रभावित हुआ और धीरे-धीरे उसका मन साहित्य में लगने लगा. वह अक्सर गोपाल सर की कहानियां सुनने के लिए चुपचाप अन्य कक्षाओं में भी जाकर बैठ जाता. हालाँकि सर के कुछ पूछने पर उसकी जुबान लड़खड़ा जाति और वह ज्ञान- शून्य सा हो जाता, पर इससे उसकी भावनाएं जागृत हो जाती. परीक्षा में अभी भी उसके अच्छे अंक तो नहीं आते पर उसे सामाजिक- साहित्यिक किताबें रिझाने लगी थी.

वह हर रोज घर आता और अक्सर अकेला- चुपचाप सा रहता. किसी के कुछ कहने पर ही जवाब देता, किंतु उसके हृदय में परिजनों के प्रति अपार स्नेह था. कभी मां को बुखार में बर्तन मांजते और पिताजी के दिनभर की थकान को देखता. वह ना तो बर्तन मांजता, न पिता जी के पांव दबाता था, परंतु उसके हृदय में बर्तनों की खनखनाहट होती और उसके पैर दुखते.

आंतरिक कोलाहल, कुछ करने की ललक, जीवन को संभालने की चेष्टा, कुछ ढूंढ लाने की दिलो- दिमाग की असामर्थ्य ने उसके जीवन में एक नए दिन की शुरुआत की. इन्हीं बेचैनियों के साथ शुरू हुआ एक सिलसिला और अपने परास्नातक की परीक्षा के बाद वह अपने एक दोस्त के साथ घर से निकल गया और धनबाद जिले के निकटवर्ती राजगंज गांव में पहुंचा, जहां दोस्त की जानकारी के ही एक छोटे से स्कूल में जूनियर टीचर के पद के लिए उसे रख लिया गया.

वह छोटे बच्चों को बड़े मनोयोग से पढ़ाता. वेतन कम थे, किंतु बच्चों के पवित्र मुस्कान व स्नेह से जो सुख मिलता उससे वह मुग्ध रहता. कुछ दिनों तक सब कुछ ऐसा ही चलता रहा, इसी बीच दोनों बहनों की शादी हो गई और दोनों भाइयों को भी अच्छी सरकारी नौकरी मिल गई और वह भी दूसरे राज्य चले गए .

घर पर मां बाप अकेले हो गए थे, पिताजी भी अगले बरस सेवानिवृत्त होने वाले थे . भंवर को फिर से बेचैनियां सताने लगी, वह मां – पिताजी को सोंच दुखी रहता. एक शाम उसने विद्यालय छोड़ने का निश्चय किया और फिर से देवघर पहुंच गया. अब वह मां – पिताजी की खूब सेवा करता, किंतु उसके बेरोजगार होने से पिताजी काफी चिंतित रहते ,पर कभी उससे कहते नहीं.

अगले बरस पिताजी भी सेवानिवृत्त हो गए और वे देवघर छोड़ वापस गांव चले आए. गांव स्थित जर्जर घर की मरम्मती हुई, खेती- बारी,खर- खलिहान की शुरुआत हुई. इसी बीच पिताजी की तबियत कुछ ठीक नहीं रहने लगी. भँवर पिताजी की देख- रेख , दवाई -दारु में कोई कसर नहीं रखता. तमाम चीजों को छोड़ वह पिताजी की हिफाज़त में रात-दिन एक करता.

इन्हीं वर्षों में बड़े भाई की भी शादी हो गई तथा छोटे भाई ने प्रेम विवाह रचा लिया. दोनों भाइयों को मां-बाप, भँवर व गांव से अब कोई मतलब न रहा. वह शहर में ही संपन्न थे व महीने -दो महीने में कभी कभार एक -आध मिनट के लिए गांव फोन कर लेते . पिताजी के पेंशन से ही अब घर चलता. दोनों बेटों के बदले हुए व्यवहार ने मां- बाप की चिंता बढ़ा दी, उससे भी ज्यादा चिंता भँवर की बेरोजगारी ने बढ़ा दी. धीरे-धीरे पिताजी अत्याधिक अस्वस्थ रहने लगे . गांव में जब इलाज संभव ना हो सका, भँवर पिताजी को लेकर बड़े भाई के घर पहुंचा. वहां एक अच्छे अस्पताल में इलाज चला पर बड़े भाई के घर अच्छे से देख- भाल ना हुआ. हर एक बात पर भँवर या पिताजी को बड़े भाई व उसकी पत्नी के उलाहने झेलने पड़े. आखिर में भँवर पिताजी को लेकर गांव वापस आ गया.

उस दिन आकाश बादलों से भरा था और रात में भयंकर बारिश हुई . उसी मूसलाधार बारिश में पिताजी के प्राण धीरे-धीरे फिसल गए . मां भी ज्यादा वक्त तक यह शोक झेल ना पाई और पांच- छः महीने में वह भी परलोक सिधार गयी. भँवर मानो पारिवारिक ,मानसिक ,आर्थिक और न जाने किन किन भँवरों में फंसा हुआ था. उसने जीवन में कई दुख जाना था परंतु ऐसा प्रलय वह आज अकेला ही देख रहा था. मन, मस्तिष्क व आत्मा पर हुए जख्मों और थकावट को चेहरे से दूर करने के लिए उसके पास कोई आंसू भी शेष न थे.

वह रोज- रोज तालाब की मेढ़ पर बैठा शिथिल हुआ जाता था. जिंदगी को संभाल पाने की दिलों- दिमाग की असमर्थता के बीच अचानक जैसे किसी ने उसे ढेला मारा, और उसके सर पर जामुन का एक बीज गिरा. उसे ऐसा आभास हुआ मानो वह भी कोई बीज हो, जो करीब पैंतीस वसंत से किसी शीशे में बंद है , जिसने नम धरती को तो देखा है परंतु उसे छुआ नहीं .

अगले ही दिन उसने गांव में मौजूद अपनी जमीन पर कई फलदार वृक्षों का बीजारोपण किया व अनेकों पौधों को रोपा. मानो वे पौधे ही अब उसके संसार थे . वह किसी पिता की भांति उन पौधों को दिनभर पालता- पोषता व शाम में बच्चों को पढ़ाता .

धीरे-धीरे समय गुजरता चला गया और पौधे उसकी संरक्षण में जवान होते चले गए. कुछ वर्षों बाद धीरे-धीरे कर के सारे पेड़ में फल आने लग गए और पूरा गांव हरियाली से जगमगा उठा. इस बार भँवर की आंखों में बसा संसार मानो आम- जामुन व संतरे की रस सा मीठा था. गांव में रहने वाले जन, दरवाजे पर बंधे गाय- गोरु अपनी खुश नसीबी पर अब इतराते फिरते कि उन्हें इतनी सारी हरियाली, सुंदरता, छाँव व ठंडक नसीब हुई.

आज जब हवा चलती तो फल से लदे वृक्ष ऐसे खिल खिलाते थे और झुक- झुक कर सम्मान करते थे, मानो वे शाम को काम-काज के बाद थक कर घर घर लौट रहे पिता की राह देखते हों. भँवर जिन सारे सुखों को को अपने पिता तक पहुंचाने से वंचित रह गया था, आज वो सारे सुख वो पेड़ भँवर तक पहुंचा रहे थे. भँवर ने निश्चित ही शादी न की, संघर्षों में गुज़री उम्र ने उससे पति का दर्जा छीन लिया. मगर आज वह सैकड़ों ऐसे बच्चों का पिता था जिसके हर बच्चे उसके लिए मर मिटने को बेताब रहते थे.

आज भँवर उस पतली सी धारा में कंकर उछलते हुए संतुष्ट व खुश हो रहा था कि उसका मन कंकड़ न हुआ और हल्का ही रहा और सदा भंवरों में भी तैरता ही रहा.

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4 comments on “पिता

  1. अद्भुत, इतने आसान लहज़े में इतना कुछ कह जाना। वाकई लाज़वाब। पिता व परिवार के माध्यम से प्रकृति संरक्षण की सुंदर प्रेरणा सहज़ व सधे लफ्ज़ों में ।
    बहुत सुंदर।

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