पुस्तक समीक्षा- इन्साफ दो

रचनाकार – गौरव निगम

‘इंसाफ दो’ हिंदी पल्प फिक्शन के सबसे बड़े लेखकों में से एक सुरेंद्र मोहन पाठक का सुधीर सीरीज का नया उपन्यास है।

कथासार-

सार्थक बराल नेपाली मूल का दिल्लीवासी युवक है जो कि अपनी पत्नी श्यामला का चारभुजी मूर्ति से क़त्ल कर देने के आरोप में जेल में बंद है। देश का दिल कही जाने वाली दिल्ली की जज़्बाती जनता को सार्थक की बेगुनाही का यकीन है। जनता के समर्थन से शुरू हुआ यह प्रयास आगे चलकर एक आंदोलन का रूप धर लेता है।

यूनिवर्सल इन्वेस्टीगेशन के मालिक, रंगीले सुधीर कोहली को सार्थक बराल के वकील की तरफ से सार्थक की बेगुनाही का सबूत ढूढने की जिम्मेदारी दी जाती है। सुधीर कोहली इस विकट काम में हाथ डालकर अपनी तफ्शीश शुरू करता है तो पाता है कि पुलिस के पास सार्थक के पडोसी,  दर्शन सक्सेना और कमल ओसवाल के रूप में तगड़े गवाह हैं जो उसके गुनाह को मोहरबंद कर रहे थे। इसके अलावा सार्थक बराल की दी हुई क़त्ल के वक़्त की एलिबाई भी झूठी साबित होती है।

सुधीर कोहली की आगे बढ़ती हुई तफ्शीश कई लोगो के कान खड़े करती है जिसमें सार्थक की बीवी श्यामला के पिता, बिज़नस टाइकून अमरनाथ परमार, उसका बेटा शरद परमार, श्यामला की बहन शेफाली, अमरनाथ का साला एमपी आलोक निगम, रॉक डिसिल्वा, माधव धीमरे, विशु मीरानी शामिल हैं। अपनी तफ्शीश के दौरान ही सुधीर कोहली को सार्थक की बीवी, भाई, पिता, मामा- मामी के बारे में कुछ घिनौने सच के बारे में पता चलता है।

समाज में धीरे धीरे फ़ैल रहे, गिज़बिजाते सच से सामना होने पर सुधीर कोहली जैसा इंसान भी हिल जाता है।

समीक्षा-

सुधीर कोहली के नॉवेल की सबसे बड़ी खासियत होती है उसमें मौजूद उसकी फिलोस्फिकल बातें जो आज की तारीख में फिलॉसफी कम, सच ज्यादा है।

यह फिलोसॉफिकल तड़का इस नॉवेल भरपूर मात्रा में भरा हुआ है।

लेकिन अगर सुधीर कोहली की जगतप्रसिद्द दर्शन वाली लाइन नॉवेल से काट दी जाये तो इसे सुधीर सीरीज या डिटेक्टिव नॉवेल कहने की जगह ‘थ्रिलर’ सीरीज की नावेल कहा जाना ज्यादा उचित है। कहानी काफी तेज़ रफ़्तार है जिससे पढ़ने वाले को रूककर क़ातिल के बारे में सोचने का मौका नहीं मिलता है।

किताब की प्रोडक्शन क्वालिटी अच्छी है पर प्रिंटिंग में कहीं कहीं ‘की’ और ‘कि’ जैसी बहुत मामूली गलतियां हैं जिन्हें नावेल पढ़ते वक़्त इग्नोर किया जा सकता है।

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