प्रणेता

रचनाकार- मुक्ता मिश्रा, हरियाणा 

है नमन उनको शमन कर दे

जो सारी वो व्यथाएं

चिखते प्रतिबिम्ब जिनके

है अधुरी कल्पनाएं

दिखता है दृश्य !

दृष्टा है ठगा दृष्टान्त से

क्यो बजाता है बिगुल

छलिया कोई अतुकान्त से

रोक लो उड़ते पतंगो के

अमिट अभिमान चर

खोल आखेटो के बन्धन

अश्रुओ की ढाल पर

तू प्रभा बन कर हरण

कर ले रवि की बांसुरी

प्रीत अंकुर से खिला दे

तू हिय की पांखुरी

उस धरा की पराशक्ति

अपरा की चाल पर

नृत्य करती बिन्दु बन कर

सिन्धुओ के भाल पर

जा की अक्षर शुन्य

तेरी भेद देगा हर दिशा

खोल देगा उस निर्गुण

ब्रह्म की सारी कथा

खोज लेगा जो प्रणेता

चिर आनन्दन की सतह

फिर सजग नयनो मे

भर देगा प्रणव की आर्थता

फिर सजग नयनो मे

भर देगा प्रणव की पात्रता !

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