बेक़सूर 

रचनाकार – सीमा गुप्ता, कानपुर

दिल में रहकर भी, वो नज़र से दूर हो गए

जो कल तक थे मजबूर, आज मगरूर हो गए

उनके राह की मशालें, जो अपने खून से थी जलाई

उनका कहना है, आज हम बेनूर हो गए

उन्हीं से बाँध रखे थे, मैंने मुस्तक़बिल के सब सपने

ऐसा जोर से झटका दामन, के सारे चूर हो गए

हवाओं में, फ़िज़ाओं में, अब तो चर्चा आम है उनका

सुना है, कल के डाकू भी आज मशहूर हो गए

दौलत की रौशनी का ऐसा जादू उन पर छाया

मेरे कातिल हुआ करते थे वो, आज बेक़सूर हो गए

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