मीठा छल

रचनाकार- सौरभ निगम

“शादी करोगे मुझसे?”
आँखें, जो पतले काजल में कुछ और खूबसूरत लगने लगती थीं, शशि के चेहरे पर फिक्स करते हुए नीतू ने सीधा सवाल किया।
“नही”, शशि ने बिना कोई हिचक दिखाए जवाब दिया।
“पक्का?”
“ह्म्म्म…पक्का”
“पर क्यों? क्या मैं तुम्हें पसंद नहीं?”
“नहीं, वो बात नहीं है…पर तुम तो जानती हो तुम्हारे पापा नहीं मानेंगे।”
“तो हम भाग जाते हैं ना?”
“बिल्कुल नहीं। प्रेम में ये फिल्मी हरकतें ठीक नही”
“फाइन…तो मैं किसी और से शादी कर रही हूंँ और अगले संडे लड़के वाले मुझे देखने आ रहे है।”
आँसू और गुस्सा नीतू के चेहरे पर एक साथ आ गए थे।
“गुस्सा तो ठीक है पर आँसू मत गिराओ, मेकअप खराब हो जाएगा, और हाँ…लड़के वालों के सामने साड़ी में जाना, उसमें खूबसूरती बढ़ जाती है तुम्हारी।” शशि ने माहौल हल्का ही रखने की कोशिश की।
“हुँह…मैं किसी भी कपड़े में जाऊं..तुम्हें क्या?”
नीतू का गुस्सा बढ़ता ही जा रहा था। “खैर, मुझे देर हो रही मुझे तो जाना होगा।” नीतू को बात खत्म करने की जल्दी थी।
“ओके, पर दूल्हे राजा की फ़ोटो तो दिखाओ”
“मैंने खुद नहीं देखा…वैसे भी तुम्हें क्या फर्क पड़ता है! घर वालों ने देखा होगा तो ठीक ही होगा। है ना?”
उसने अपना पर्स उठाया और पलट कर वापस देखे बिना तेज़ी से बाहर की तरफ बढ़ चली।
……………………………………..
आज इतवार का वो दिन था, घर का हर सदस्य बिजी दिख रहा था, आखिर लड़के वाले आधे घंटे में पहुँचने वाले थे।
“दीदी लड़के वाले आ गये…जल्दी से नीचे आ जाओ।”
छोटी बहन ने नीचे से आवाज़ दी। नीतू के मन में अजीब सी कश्मकश थी, मोबाइल उठाया और सोचा कि एक आखिरी बार कॉल कर ले शशि को, क्या पता अभी भी बिगड़ी बात संवर जाए…कि तभी शशि के नम्बर से मैसेज ब्लिंक हुआ…”All the Best”
जाने क्यों मैसेज देखकर उसकी आँखों में फिर से आंसू आ गये। रही सही उम्मीद भी बुझ गयी। उसका नंबर डिलीट करके मोबाइल एक तरफ रख दिया।
“जल्दी करो बेटा।” नीचे से आवाज़ आयी।
नीचे, छोटी बहन ने चाय की ट्रे उसको देते हुए कहा “आज पीली साड़ी में तो तुम ‘विवाह’ वाली ‘अमृता राव’ लग रही हो।”
अपने ही परिचित कमरे में उसे कुछ अनजान लोगों के बीच में बैठा दिया गया, जहां हर कोई उसको अपने आने तरीके से देख रहा था। क्या करती हो? क्या क्या शौक हैं? क्या क्या बना लेती हो ?
जितने लोग, उससे ज्यादा सवाल।
“देखिये भाई साहब, बिटिया तो हमें बहुत पसंद है…बस लड़का-लड़की एक दूसरे को देख ले तो …”
उसने कनखियों से सामने बैठे लड़के को देखा जो सीधे उसी की तरफ ही देख रहा था। सकपकाकर नीतू ने नजरें नीचे कर ली। ढंग से देख भी न पाई। ऐसे कैसे किसी अंजान आदमी के साथ जिंदगी की राह पर बढ़ चले। उसकी आंखें फिर से छलकने को आतुर थीं।
“सॉरी पापा , मैं थोड़ा लेट हो गया …कुछ ज्यादा ही ट्रैफिक था आज” कमरे में दाखिल होते हुए किसी की नई आवाज गूंजी।
“ये तो उसी की आवाज़ थी।” एक झटके से नीतू ने सर उठाकर इधर उधर देखा।
“लीजिये भाई साब, आ गया लड़का!”
नजरें मिली तो सामने ब्लैक शर्ट में खड़ा शशि मुस्कुरा रहा था…वही जानी पहचानी स्माइल जो नीतू को जान से ज्यादा प्यारी थी।
“तुम!”
नीतू को भरोसा नहीं हो रहा था की वो उसके सामने खड़ा था। कलेजे में ठंडक पड़ना क्या होता है वो आज समझ रही थी।
“जी मैडम, मैं” शशि थोड़ा झुककर पोज़ देता हुए बोला। उसके होठों पर अभी भी शरारती मुस्कान थी।
“बेटा, ये सबका प्लान था, कि तुम्हें सरप्राइज दें।”
शशि की माँ ने नीतू को गले लगाते हुए कहा।
“सरप्राइज़ड कम, शॉक में ज्यादा लग रही है नीतू” शशि केे बड़े भाई ने मुस्कुराते हुए कहा।
“हे भगवान! ये इसके बड़े भाई है, और उसे लग रहा था कि यही लड़का है।” नीतू ने इस बात की प्रतिक्रिया में शशि की तरफ जरा सी आंखे तरेरी।
“जीजू आपके हाथ की चाय…आपने प्रॉमिस किया था कि प्लान सक्सेस्फुल रहा तो आप चाय खुद बना के पिलायेंगे।’
छोटी बहन ने ‘जीजू’ कह के जैसे सबकी तरफ से बात फाइनल कर दी।
“बिल्कुल अभी बनाता हूँ, बताओ किधर है किचेन?” वो बिल्कुल उसके सामने खड़ा होकर, उसकी आँखों में आँखें डाल के पूछ रहा था।”
“आइये” उसने भी आंखों घूरते हुए पीछे आने का इशारा किया।
किचन में पहले तो दो तीन मिनट सन्नाटा रहा …फिर उसका गुस्सा फूट पड़ा।
“तुम ना…दुष्ट हो…बता नहीं सकते थे?”
“अरे तुम्हें तो खुश होना चाहिए …इतनी मेहनत से सरप्राइज प्लान किया और तुम रो रही! वैसे पीली साड़ी में तो गज़ब ढा रही हो मोहतरमा।”
“ज्यादा मस्का मारने की जरूरत नहीं है।” नीतू ने गैस की नॉब धीरे करते हुए कहा।
“सॉरी'”
“मुझे तुमसे बात ही नहीं करनी है।” नीतू लड़ने के पूरे मूड में थी।
“सॉरी बोल तो रहा।”
लड़के ने मासूमियत से अपने दोनों कान पकड़ते हुए कहा।
4-5 सेकंड तक वो उसको ऐसे ही देखती रही । फिर अपने आप ही उसके सीने से जा लगी।
बहुत देर से रोककर रखे आंसू शशि की शर्ट भिगो रहे थे और उधर चूल्हे की आंच में प्यार और चाय दोनों पक चुके थे।

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