मैं, मेरी पत्नी और मेरा साला

रचनाकार- पंकज मिश्रा 

मैं बड़ी मुश्किल में फंस गया हूँ भाई साहब…ऊपर से तुर्रा ये कि अपनी ही सगी बीवी की वजह से।

बीवी हाथ बांधे, मेरे सामने बैठी है और पिछले दस मिनट से बायीं दीवार पर लगी हमारी फॅमिली फोटो को घूरे जा रही है। साले साहब सामने बैठे लाल लाल आँखों से काले लंगूर की तरह मुझे यूँ घूरे जा रहे हैं जैसे मैं ठेले पर पड़े केले का पका हुआ गुच्छा हूँ जिसे वो मौका मिलते ही बिना डकार लिए चबा जाएंगे। मेरे दोनों पिता (एक जो मेरे पैदा होने के बाद पिता बने और एक जो मेरी शादी होने के बाद अपनी बेटी यानि मेरी बीवी के साथ साथ मेरे भी पिता कहलाये) फ़ोन करके ‘जरा कायदे में रहा करो’ का फ़रमान सुना चुके हैं।

“जिज्जा, जो हमारी दीदी से कोई गलती हुई है तो साफ़ बोलो, हम बात कर लेंगे उससे…लेकिन जे तो सरीफ जीजा के लच्छन तो ना हैं” हमारे साले, त्रिभुवन त्रिवेदी शहर के माने जाने ठेकेदार हैं और ऐसे में आप समझ ही सकते हैं कि मेरे जैसा क्लर्क की पदवी वाला आदमी किस मुंह से तनतना कर कहे कि साले साहब, सारा किया धरा तेरी बहन का ही है जो बिना बात का बतंगड़ बन गया है.

परसों ही हमारे प्यार की निशानी शैलेश (जिसे हमारे साले साहब हमेशा चिंटू ही कहते हैं) की पढाई को लेकर हम मियां बीवी में जरा सी झिकझिक हो गई थी। अब अगर आप मेरी तरह पति हैं तो आप भी मेरी तरह कंफ्यूज होते होंगे कि बात बहस थी या युद्ध…यह हमेशा बीवियां ही क्यों तय करती हैं।

खैर, आम पतियों की तरह मैंने भी सोचा की रात गयी बात गयी और चलो अब बीवी का मूड खुश कर देते हैं, सो सुबह इनके उठने से पहले ही किचन में मॉर्निंग टी बनाने लगा। मुझे कई बार शक हुआ है कि मेरे ससुराल वालों ने बिना मुझे बताये किसी सुपरश्रवणशक्तियों से युक्त महिला को मेरी बीवी बना कर विदा कर दिया था जिसका नमूना मैं अक्सर तब पाता हूँ जब मेरी किसी महिला मित्र का फोन आता है।

चाय बनाने की मामूली खटपट सुनकर ही वह किचेन के दरवाजे पर आ खड़ी हुईं और सारी प्रक्रिया देखने लगीं।

जब वह दोनों हाथ ऊपर कर अपना जूड़ा बनाने लगीं तो मैं भ्रमित हुआ कि चलो भई झगडा खतम और यह अदाएं दिखाना उनका प्यार है लेकिन जब वह यह कहकर लौट गईं कि “अगर चायपत्ती सिंक में फेंकी, तो शाम को साफ़ भी खुद ही करना” तो मेरे प्यार का खुमार उसी चूल्हे पर उबल कर फ़ैल गया।

खैर, जब मैं यह मान कर चल रहा हूँ की आप भी मेरी तरह पत्नीधारी हैं और दिमागी तौर पर नार्मल हैं तो मुझे आपको बताने में कोई संकोच नहीं है कि परसों की कुनकुनी बातों को भुलाने के लिए मैंने कल क्या क्या किया था।

खुद से चाय बनाने के बाद मैं अपने चिंटू को स्कूल बस तक खुद छोड़ने का बीड़ा उठाया जिसके एवज मेरे चिंटू की मम्मी के साथ साथ बस के किनारे खड़ी मेरे चिंटू के दोस्तों की मम्मियों ने भी अपनी खूबसूरत आँखे फैलाकर मेरी तरफ देखा था। लौटकर आने के बाद, नहाकर गीला तौलिया बाथरूम या बेड पर छोड़ देने की जगह बाकायदा क्लिप लगाकर तार पर सूखने के लिए डाल दिया। ऑफिस जाने से पहले कंघी, रुमाल जैसी चीजों के लिए आवाज देकर दौड़ाने की जगह खुद सारा सामान ले लिया और भाई साहब मजाल क्या है जो एक भी नग छूटा हो। हमारी धर्मपत्नी जी के दोपहर में सोने के शेड्यूल का ख्याल कर हर रोज की तरफ फ़ोन भी नहीं किया। शाम को ऑफिस से निकलने के बाद अपनी पत्नी जी की सुंदरता से मैच करता हुआ गुलाब जेब में रख लिया था, जो कि अफ़सोस है कि 8 रुपये का होने के बावजूद सिटी बस की भीड़ में ऐसा कुचला गया कि जेब में सिर्फ चंद पंखुरियाँ ही बची रह पायीं। खैर, IIN से पढ़े किसी सयाने ने कहा है कि प्यार का रास्ता पेट से होकर भी जाता है और किचेन में हमारी कला सिर्फ चाय और मैगी बनाने तक सीमित है इसलिए हमने अपनी बीवी को किचन की गर्मी से कम से कम एक दिन बचाने के लिए मोहनलाल रेस्टोरेंट से खाना भी पैक करा लिया। बीवी को ‘आज खाना न बनाना’ का मैसेज किया तो सिर्फ जबाब में बहुत देर तक ‘टाइपिंग…’ दिखते रहने के बाद सिर्फ hmm ही मुझ तक पहुँच पाया था।

लौटकर तूफ़ान से पहले वाली शन्ति और उनका ख़राब मूड देखते हुए हम संयम और शांति का तकिया लगाकर रात में जैसे तैसे सो गए।

सुबह उठा तो साले साहब बरामदे में बैठे चाय पी रहे थे।

“देखिये भाई साब…बात कोई नही है, आप तो जानते ही हैं कि मियां बीवी के बीच में गलतफहमी हो ही जाती है…छोटी सी बात है”

“छोटी सी बात हैss?” मेरी बीवी जब भी इस तरह चीखती है तक मेरा इस बात पर और यकीन हो जाता है की मेरी बीवी शांत होकर मुस्कुराती हुई ही सुंदर लगती है, “भइया… हम कह रहे तुमसे…इस आदमी का अब हमसे मन भर गया है…ज़रूर कहीं और इसका दिल लगने लगा है”

“क… क…कैसी बातें करती हो चिंटू की मम्मी! तुम्हारे होते हुए मैं भला किसी और की तरफ देखूंगा?”

 “यानि मेरे जाने के बाद देखोगे?  देखा भैया, सारा प्लान बना कर बैठा है यह आदमी”

जी में आया की कह दूं कि प्लान तो मेरे सारे शादी के बाद ही बनने बंद हो गए थे बेग़म, अब तो सिर्फ घर के राशन पानी लाने का प्लान बना पाता हूँ।

“कैसे प्लान की बात कर रही हो प्रिय?”

“मत कहो मुझे प्रिये” वह अपने भाई की तरफ़ घूम गई, जिसे इस उम्र तक अविवाहित रहने की वजह से गृहस्थी की कुछ बुनियादी बातों की समझ अभी तक नहीं आयी थी, “भैया… तुम तो जानते हो मैं चिंटू और घर को अकेले ही सम्हालती हूँ। परसों हमारी बहस हुई है और कल से ही इस आदमी के तेवर बदले हुए हैं। जिसकी आँख बिना चार बार झकझोरने से नहीं खुलती थी वो मुझे स्टाइल दिखाने के लिए मुझसे पहले उठकर अपने लिए खुद ही चाय बनाने लगा, चिंटू को रोज मैं छोड़ने जाती थी…कल न सिर्फ चिंटू को बस तक छोड़ने गया बल्कि मिसेज मल्होत्रा से भी बड़ा हंस हंस कर बतिया रहा था। रोज दोपहर में फ़ोन करके मेरी खबर लेता था लेकिन कल तो कोई फर्क नही पड़ा इनको कि मैंने लंच किया या नहीं…यहाँ तक कि मेरे हाथ का खाना ना खाना पड़े इसलिए बाहर से खाना पैक करा लाये। और तो और भैया…” बीवी ने मैक्सी के किनारे से अपने गाल पोंछे “रात में जब रोज की तरह जेब चेक किया गुलाब की कुछ मसले हुए फूल मिले…मेरी तो जिन्दगी बर्बाद हो गई है भैया…मैं न कहती थी पापा से मेरे लिए वो इंदौर वाला ही ठीक था”

अब साले साहब जाने किस किस वकील, नेता को फोनकर ‘अर्जेंट मसला है’ समझा रहे हैं, बीवी फिर से दीवार पर टंगी हमारी फॅमिली फोटो को घूर रही है, और मैं चिंटू को गोद में बैठाए उस इंदौर वाले को कोस रहा हूँ जो खुद निकल कर मुझे इस बवाल में फंसा गया है।

अन्य कहानियांलघुकथाएं, साहित्य चर्चा  पढने के लिए क्लिक करें।

Comments

comments

2 comments on “मैं, मेरी पत्नी और मेरा साला

  1. हाहाहा_!
    गृहस्थी की ग्रहस्थिती ठिक नही है लगता है!

    1. शायद इसीलिए उसे ‘ग्रहस्वामिनी’ भी कहा जा सकता है। 🙂

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *