लाइब्रेरी

रचनाकार-  सुनीत कुमार शर्मा,हाथरस-उत्तरप्रदेश
वो आज फिर वहीँ खड़ा था, पहले वो भले ही वहाँ अकेला आता रहा हो किंतु आज उसके साथ उसका 10 बरस का बेटा भी था। निगाहों पर मोटे लेंसों का चश्मा लगाये, सफ़ेद कमीज और काली पतलून पहने हुए वो करीब चालीस साल का लग रहा था जो कि उसकी वास्तविक उम्र नहीं थी। समय की मार उसकी जवानी को जबरन बुढ़ापे में तब्दील किये जा रही थी। पेशे से वो कंप्यूटर हार्डवेयर इंजीनियर था लेकिन हाल फिलहाल रूपये-पैसे के मामले में उसका हाथ तंग था जो कि उसकी योजना के अनुसार अब ज्यादा दिनों तक नहीं रहने वाला था।  उसने अपनी झाइयों भरी सूनी आँखों से ऊपर लगे बोर्ड पर निगाह डाली जिस पर लिखा हुआ था ‘बोस पुस्तकालय’ और उसी बोर्ड के नीचे एक और बोर्ड ‘बिकाऊ! इच्छित व्यक्ति संपर्क करें’ लगा हुआ था। नीचे वाले बोर्ड को देखकर उसने अपना मुँह बनाया और वो पुरानी यादों में खो गया।
वो भी दस साल का था जब पहली बार उसके पिताजी उसे इस लाइब्रेरी में फुसलाकर लेकर आये थे।  उन्होंने कहा था कि वो उसे ज्ञान का खजाना दिखाने ले जा रहे हैं और वो मासूम उनकी बातों में आकर वहां चला आया था। वो मन ही मन सोचने लगा न जाने कैसी जगह है जहाँ बच्चे, बड़े, बूढ़े मिलाकर लगभग 50 से ज्यादा लोग मौजूद हैं लेकिन फिर भी इतनी शांति है और वो लोग बिना एक दूसरे से बातें करते हुये केवल और केवल अख़बारों, पत्रिकाओं और मोटी-मोटी किताबों को पढ़ रहे हैं। अपने पिताजी की देखादेखी उसने भी एक रंग-बिरंगे चित्रों से सुसज्जित एक पतली सी किताब उठाई जिसके बारे में उसके पिताजी ने बताया कि ये कॉमिक्स होती है। अगले 2 घंटे उसके पिताजी अख़बारों से जूझते रहे और वो कॉमिक्सों से । वो इस बात से कतई बेख़बर था कि ये दो घण्टे उसके जीवन को बदलने वाले थे। उस दिन उसे पढ़ने का ऐसा चस्का लगा कि उस लाइब्रेरी में उसकी हाज़िरी रोज की बात बन गयी। दोपहर को विद्यालय से लौटकर वो हर शाम के दो घंटे लाइब्रेरी में बिताता था। गर्मियों की छुट्टियों में वो अपना पूरा दिन वहीँ बिताता था। जैसे-जैसे वो बड़ा होता गया पढ़ने का उसका शौक भी बदलता गया। कॉमिक्स से शुरू करके वो जासूसी उपन्यास, सामाजिक उपन्यास, हिंदी साहित्य, धार्मिक साहित्य की वहां उपलब्ध सारी किताबें पढ़ चुका था। वो वहां का सम्मानित सदस्य था और उसको उस लाइब्रेरी की हर किताब की स्थिति की पूरी जानकारी थी। पढाई और नौकरी की खातिर जब उसने शहर छोड़ा था तो इतना दुःख उसे अपना घरबार छूटने से नहीं हो रहा था जितना कि लाइब्रेरी छूटने से। अपने पढ़ने के शौक के बारे में पूछने पर वो जवाब देता था कि यही किताबें उसकी ऱोजी रोटी का जरिया बनेंगी। गाहे-बगाहे जब कभी वो अपने कस्बे में आता तो लाइब्रेरी जरूर जाता और वहां की स्थिति को देखकर चिंतित हो उठता।
पढ़ने वाले कम होते जा रहे थे जिससे लाइब्रेरी का खर्च भी नहीं निकल पा रहा था, ऐसी कई जानकारियों की खबर उसे वहां के उसी मुलाजिम से मिली जिसको वो लगातार वर्षों से लाइब्रेरी की डेस्क के पीछे देखता आ रहा था। दस साल पहले जब वो वहाँ आया था तो केवल वही वहां का इकलौता पाठक था, इन्टरनेट और केबल टीवी के आगमन से लाइब्रेरी अब केवल 30″ X 10″ का एक कमरा भर रह गयी थी। उसके बाद के चक्कर पर उसे लाइब्रेरी में ताला लटका हुआ मिला और सबसे आखिरी के फेरे में दरवाजे पर ताला और एक लटका हुआ ‘बिकाऊ’ का बोर्ड दिखाई दिया जिससे उसका मन खिन्न हो उठा।
“पापा!” उसके बेटे की पुकार से उसका मन वापस वर्तमान में लौटा।
“मुझे खजाना दिखाओ न!” अपने बेटे की आवाज सुनकर वो थोड़ा मुस्कुराया और अपनी जेब से चाबी का एक गुच्छा निकाल कर उसने फट से लाइब्रेरी का ताला खोल दिया। अंदर की धूल देखकर उसके चेहरे पर थोड़े असंतोष के भाव आये और अपने बेटे को बाहर छोड़कर वो अंदर गया और करीब 20 मिनट बाद धूल और मकड़ी के जालों से लिपटा हुआ बाहर आया। बाहर आकर सबसे पहले उसने अपने कपड़ो को झाड़ा और अपने बेटे को लेकर अंदर पहुँचा। किताबें आज भी उन्हीं लोहे और लकड़ी की अलमारियों में उसी प्रकार सजी हुई थी जैसे कि उसके बचपन में सजी रहती थीं। दीमक और चूहों ने भी ज्ञान के खजाने को सम्मान बख्शा था। उसका बेटा कभी उसे और कभी किताबों को देखता। उसने अपने पापा को इतना प्रसन्न कभी नहीं देखा था।
“पापा आप तो कह रहे थे कि यहाँ खजाना छुपा हुआ है, लेकिन यहाँ तो बस किताबें ही किताबें है। खजाना कहाँ है?” उसके बेटे ने मासूमियत से पूछा।
जवाब में उसने एक अलमारी की तरफ इशारा कर दिया जिसमें इंद्रजाल के अलावा और भी कई पुरानी कॉमिक्सें थीं।
लड़के ने जब उस अलमारी पर निगाह डाली तो उसने गुस्से से पूछा, “मतलब आपने केवल इन किताबों को खरीदने के लिए अपना प्लॉट बेचा।”
वो मुस्कुराया और अपने बेटे को लाइब्रेरी के अंदर बने एक और कमरे में ले गया और अपने पास मौजूद चाबियों से एक अलमारी खोल दी जिसके अंदर बहुत पुरानी पांडुलिपियां मौजूद थीं। “ये आया खजाना!” वो गर्व से बोला।
“इन कागजों को खरीदने के लिए आप इतने दिनों से मम्मी को रुला रहे थे।” लड़के के स्वर में नफरत का पुट था।
“तुम नहीं समझ पाओगे और न ही तुम्हारी मम्मी। उस सौ गज के प्लॉट में बहुत छोटा सा मकान बनता। लेकिन मैं तुम्हारे लिए बड़ा मकान बनवाना चाहता हूँ एक कार भी खरीदना चाहता हूँ। खैर अभी मुझे परेशान मत करो।” इतना कहकर उसने अपना फोन निकाला और एक नम्बर पंच किया। दूसरी तरफ फोन उठते ही उसने अपना परिचय दिया और कहा, “बहुत कर ली आपकी गुलामी अब और नहीं करनी। मैं नौकरी छोड़ रहा हूँ और मेरी कल तक की तनख्वाह मेरे अकाउंट में पहुँचा देना।” उसने दूसरी तरफ से बोले जाने वाले शब्दों को सुनने से पहले ही फोन काट दिया।
उसने एक दूसरा नंबर मिलाया और अपना परिचय देकर बोला, “सर अब ड्राफ्ट बना दीजिये, रुपया मेरे अकाउंट से ट्रांसफर कर देना। फॉर्म आपको दे ही आया था। …हाँ 25 लाख का बनेगा। पर्ची पर सब लिख छोड़ा है मैंने और जानकारी वहाँ से ले लेना।” इतना कहकर उसने फोन काट दिया।
उसने तुरंत ही फोन से एक और कॉल की और कहा, “आपका ड्राफ्ट तैयार हो रहा है, शाम को ड्राफ्ट की फोटो भेज दूंगा और मैं कल ड्राफ्ट आपको सौंप दूंगा और आपसे लाइब्रेरी के कागज ले लूँगा। डील डन।”
उसने वहीँ खड़े-खड़े आखिरी कॉल की और कहा, “सौदा हो चुका है, अब दो दिन में मेरी वेबसाइट बना दो। डिटेल्स मैं तुमको मौखिक बता चुका हूँ अगर कोई शंशय हो तो अपना ई-मेल चेक करना मैंने कल ही तुमको अटैचमेंट भेजा है। ठीक है!”
उसने एक चमक भरी निगाह उस लाइब्रेरी पर डाली और अपने बेटे के साथ बाहर निकल कर लाइब्रेरी का ताला बंद किया और ‘बिकाऊ’ वाला बोर्ड वहां से उतारकर फैंक दिया। घर लौटते समय उसका बेटा ये सोचकर हलकान हो रहा था कि उसके पिताजी ने इन किताबों के चक्कर में अपनी नौकरी छोड़ दी और प्लॉट भी बेच दिया।
जबकि वो सोच रहा था कि कैसे उसने इस एक साल में ऑनलाइन नीलामी वेबसाइट्स पर ऊंची ऊंची बोली लगाकर इंद्रजाल कॉमिक्स की एक प्रति की कीमत कम से कम 10,000 और ज्यादा से ज्यादा 50,000 करवा दी, एक मूल पाण्डुलिपि की कीमत भी 1,00,000 से क्या कम मिलेगी। उसे खूब ध्यान था कि लाइब्रेरी में हिंदी और अंग्रेजी की मिलाकर इंद्रजाल की करीब 400 कॉमिक्स व 200 के करीब उपन्यासों की मूल पांडुलिपियां थीं इनके अलावा लाइब्रेरी में कुछ दुर्लभ उपन्यासों और दुर्लभ पत्रिकाओं का भी तो संग्रह मौजूद है। ये सारी किताबें अब उसकी वेबसाइट पर नीलाम होंगी और शायद अब उसे किसी की नौकरी नहीं करनी पड़ेगी। उसे अपने पिताजी के कहे शब्द याद आ रहे थे “किताबें ज्ञान का खजाना होती हैं।” लेकिन उम्र के इस पड़ाव पर आकर उसने शब्दों को अपने अनुसार बदल लिया था कि “किताबें खजाना होती हैं।” उसके अनुसार 25 लाख भले ही एक झटके में खर्च हो गए हों लेकिन अगले दो साल में उसने 3 करोड़ कमाने की योजना बनाई थी। ‘किताबें ही उसकी ऱोजी रोटी का जरिया बनेंगी’ आज उसका ये वक्तव्य सही साबित होने जा रहा था।
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