शीतल जल

रचनाकार- सविता मिश्रा ‘अक्षजा’, इलाहाबाद

विषय- डिजिटल रिश्ते

फेसबुक खोलकर नीलम बैठी ही थी कि खुसुरफुसुर का डिब्बा फुसफुसाया। उसका सारा ध्यान उस समय होमपेज पर गुजरती पोस्टों पर था। कल की दिनदहाड़े एक घर में माँ-बेटी के साथ बलात्कार और उसके बाद माँ, दो बेटी और उसके पति की हत्या वाली घटना छायी हुई थी।पढ़कर नीलम की रूह काँप उठी थी। उसी में कई लोगों का यह कमेन्ट करना कि यार होंगे लड़कियों के। आजकल की लड़कियाँ कम थोड़े ही हैं। उन्होंने बुलाया होगा और दरवाजा खोला होगा, फिर मनमुटाव हुआ होगा; जिसकी परिणीति यह घटना है। वरना ऐसी वीभत्स घटना का होना इस शहर में नामुमकिन है।
कमेन्ट पढ़ते ही नीलम का रक्त उबल पड़ा था। वहीं उधर ऑनलाइन होने के कारण डुबुक डुबुक की आवाज लगातार होने लगी थी।
मेसेंजर खोलकर देखा तो डियर शब्द काटने को दौड़ रहा था। वह अनदेखा कर फिर कुछ लिखने में व्यस्त हो गयी। लेकिन बार बार वह आवाज उसे डिस्टर्ब कर रही थी। थोड़ा गुस्सा होकर उसने मेसेज खोला तो देखते ही आगबबूला हो उठी। किसी ने चार-पांच बार हाय डियर- हाय डियर कहके बड़ा गन्दा सा मेसेज किया था।
तभी बगल में रखा लैंडलाइन फोन घनघना उठा।
“स्साला कुत्ता कहीं का। ऐसे ही टुच्चे लोग पुरुष के नाम पर धब्बा हैं!” गुस्से में ध्यान ही नहीं रहा कि वह रिसीवर उठा चुकी है।
“अरे भई क्या हुआ! क्यों क्रोधाग्नि प्रज्ज्वलित हुई है आज?” सामने से आवाज गूँजी।
“…” चुप्पी साधकर आवाज पहचानने की कोशिश करने लगी।
“मोहल्लें वालों ने फिर कुछ कहा क्या!!” थोड़ी परेशानी भरी आवाज उधर से आयी।
तब तक क्रोध थोड़ा शांत हो चूका था। वह बोली-” “नहीं शिखा यार!”
थोड़ा सशंकित स्वर उभरा- “अरे फिर! कहीं फेसबुक ने तो क्रोध में उबाल नहीं ला दिया।”
“हाँ ! मुहँ में दाँत नहीं हैं, लेकिन खींस निपोरते हुए पहुँच जाते हैं गुपचुप बॉक्स में।” खीझते हुए नीलम बोली।
“आज किसे देख लिया ?”
“अरे दिखा एक। कहने को तो साहित्य का खिलाडी है, किन्तु कमीना साहित्य की चौपाल बिछाकर असल में औरतों की इज्जत से खेलता है।”
“ब्लाक कर दो। मैं तो दूर से भी देखती हूँ ऐसो को, तो ब्लाक कर देती हूँ। न रहेगा बांस और न ही बजेगी बाँसुरी।” समझाती हुई बोली शिखा ।
“अरे यार, कब का कर दिया। स्टेटस डालकर उसे फेसबुकियों के सामने एक्सपोज भी कर दिया। ”
“बस तो हो गया, अब ठण्ड रख।” शिखा ने कहा।

“पंद्रह मिनट भी नहीं हुआ मायाबी दुनिया में झांकते हुए कि , यह नालायक़ तो तीसरा बन्दा है। अच्छा चल मैं फिर फोन करती हूँ! एक मैसेज पिंग हुआ है! और पोस्ट पर भी बहस चल रही है!” नीलम लगभग झल्लाते हुए बोली।

तभी दूसरे कमरे से पति की आवाज आई- “अब एक कप गरमागरम चाय पिला दो! इन फाइलों पर दिमाग लगाते लगाते सिर में दर्द होने लग गया।”
“दो मिनट ठहरो! कमेन्ट करके अपने अंदर की उबाल ठंडी कर लूँ।”
“सालो पहले जब फेसबुक शुरू किया था तुमने तब याद है?” पास आकर उसे कमेन्ट में गाली लिखते देख बोल पड़ा।
“हाँ, याद है। कैसे भूल सकती हूँ। खून तो तब भी खौलता था। लेकिन खुद का ही दिल जलाती थी और खून भी। फिर अपने ही आँसुओं से ठंडक पहुँचाती थी दिल को।”
“और अब! कितनी बदल गयी तुम, लोग भी यही सोचते होंगे शायद तुम्हारे बारे में।”
“नहीं, बदली नहीं हूँ। बस परेशान करने वालों को जवाब देना सीख गई हूँ। जब मैं गलत नहीं हूँ तो मैदान छोड़कर भागूँ क्यों भला?”
“नहीं, लड़ो लड़ो। एक यही जगह तो है जहाँ बातों से लड़ा जा सकता है !”
“अच्छा बैठो, चाय बना ही ले आऊँ। नहीं तो तुम सुनाते ही रहोंगे कुछ न कुछ।”

थोड़ी ही देर में गरमागरम चाय लेकर आ गई।
“अरे, बड़ी जल्दी बना दिया तुमने!”
“हाँ, मेरा गुस्सा भी गैस की लपट में शामिल हो गया था न!” कहकर दोनों ही खिलखिला पड़े।

तभी दरवाजे की घण्टी बजी। खोलते ही सामने शिखा को देखकर नीलम बोली-“अरे तुम ? अभी तो फोन पर बात हुई थी।”
“हाँ तू परेशान थी, तो सोचा चलूँ आमने सामने मिलकर बात करूँ। कुछ तेरा दर्द सुनु कुछ अपना सुनाऊँ।” मुस्कराते हुए बोली वह।
“आ बैठ! यह अच्छा किया तूने।”
“यह भी लगा कि कहीं तू गुस्से में अपनी आईडी ही डीएक्टीवेट न कर दे!”
“अरे यार कर देती। कई बार किया भी। पर तेरे बिन रहा न जाय और तुझे सहा भी न जाय वाला हाल है।”
“अच्छा तू बता तुझे परेशानी नहीं होती है?”
“अरे होती क्यों नहीं! स्त्रीलिंग में प्रोफ़ाइल का नाम हो और परेशानी से बचे रह जाये, यह तो नामुमकिन है।” शिखा ने कहा।
“किन्तु तुझे तो कभी किसी को भी एक्सपोज करते नहीं देखा मैंने!” नीलम आश्चर्य से बोली।
“यार एक्सपोज करके क्या कर लूँगी! इधर मैं चीख चीख उसे गन्दा आदमी कह रही होऊँगी और उधर वही आदमी दूसरी औरत की आईडी में पड़ा अठखेलियाँ करता पड़ा रहेगा।” शिखा ने अपनी बात कही।
“हाँ यार, कई बार तो लगता है , कई औरत, औरत भी है या नहीं !” शिखा शक करते हुए बोली।

हाँ -हाँ -हाँ, हँसते हुए नीलम बोली – “सही पकड़ी है। लेकिन एक-दो का पता कि वह महिला ही है। लेकिन उनके कमेन्ट और पोस्ट देखकर मुझे भी भरम होता है।”
“औरत समझ जोड़ने की गलती हो जाती है कभी कभी। दो तीन औरतों को तो मुझे ब्लाक करना पड़ा। मेसेज में गन्दगी फैला रहीं थी यार! शिखा घृणा से भरकर बोली।

“सही कह रही हो तुम! उधर बीच में किसी एक कवयत्री की कविता खूब शेयर हो रही थी।” नीलम की निगाहें प्रश्न करती हुई बोली।
“हाँ, मैंने भी देखा था कई उसे गालियां दे रहे थे तो कई समर्थन कर रहे थे।” शिखा ने कहा।
“यह सब पढ़कर मन बेचैन हो जाता है, ऊपर से ये मेसेज में आने वाले एक तो करेला दूजे नीम चढ़ा हुआ फेसबुक का एहसास कराते।” नीलम झुंझलाई।

” तू एक गुपचुप डिब्बे से परेशान है, कई औरतों की पोस्ट तो इतने वाहियात होतीं हैं कि देखकर ही शर्म आ जाये। और खुलकर चर्चा भी करतीं हैं पुरुषों से भी।” नीलम ने उसकी बात को आगे बढाते हुए कहा।

“हाँ, सही कह रही हो तुम। बस इस फेसबुक की कई अच्छाइयां हैं जो इसको छोड़ नहीं पा रही मैं भी !” नीलम ने सहजता से कहा।

“हाँ यार, जहाँ कड़वा है, तो मीठा भी है! आखिर यही फेसबुक ही तो है जिसके कारण हम दोनों मिले। बात होते होते घनिष्टता हुई और आज आमने सामने चार दिन में न मिले तो गुजारा ही न हो जैसे हमारा।” शिखा के ओठों पर मुस्कराहट तैर गयी।

“सही बात, इतना कुछ तो दिया है फेसबुक ने। और सबसे बड़ी बात हम अपनी बात इस माध्यम से रख सकते हैं।” नीलम ने मुस्कराते हुए कहा
“हाँ सही कह रही तू। कलम भी फर्राटे से चल पड़ी है। अब तो लगता है ऑनलाइन जिंदगी खत्म ही न हो!” शिखा भी मुस्करा कर बोली|

बात करते करते सब्जी रोटी बन गयी थी। नीलम अपने पति को खाना परोस आयी। फिर दोनों ही मिलकर खाना खाने बैठी। चटपटी बातों से उन दोनों को पता ही न चला कि बातचीत में उन्होंने सब्जी में नमक कम डाला था, और मिर्च तो डाली ही न थी। पति खाना खत्म करके बाहर आकर बोले- “बिलकुल फीकी सी सब्जी बनी है।” तब उन्हें आभास हुआ इस बात का।
बर्तन समेटते हुए नीलम बोली- ” फेसबुक की चटपटी चर्चा में मैं नमक- मिर्च डालना भूल गयी, तो सोच फेसबुक चलाते समय क्या-क्या भूल जाती हूँ। दो बार तो दूध जल जाने पर डाँट खा चुकी हूँ। इसके खत्म होने पर जिंदगी की रफ्तार क्या होगी राम जाने।”
तभी मोबाईल में डुबुक आवाज आई। नीलम मुस्करा कर बोली-“देख, एक और नालायक़ ‘हाय डियर’ कहके उभरा है। ये चेहरे से सम्भ्रांत से लगने वाले असामाजिक लोग खत्म हो जाये तो फेसबुक हम जैसो के लिए स्वर्ग हो जाये!”
” अरे मैडम जहाँ स्वर्ग होगा तो नरक भी तो होगा ही न! अच्छा, चल सम्भाल इन डुबकी लगाने वालों को। बस दिल पर नहीं लिया कर। अब मैं चलती हूँ, बहुत देर हो गयी। ऑनलाइन जिंदगी पर एक प्रतियोगिता में कहानी लिखनी है मुझे।” शिखा ने उठते हुए कहा।
“अच्छा!! लिख लिख। मुझे भी लिंक जरूर भेजना। मैं भी पढूंगी इस विषय पर तेरी कहानी। तुझसे इस विषय पर बात करके दिल को ठंडक पड़ जाती है तो तेरी कहानी क्या करती यह देखना है मुझे।”
“ठीक है , मिलती हूँ फेसबुक पर कहानी के साथ।”
उसके जाते ही पतिदेव मुस्करा कर बोले- “पड़ गया क्रोधाग्नि में शीतल जल।”
मेरी शीतल जल के आसपास भी मत फटकना तुम! कहे देती हूँ।
एक बार फिर कमरा ठहाको से गूँज गया।
डुबुक-डुबुक की आवाज ठहाको के बीच गुम हो चुकी थी। और साथ ही कान और दिमाग से भी गायब|

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