सच्चा सैनिक

रचनाकार- डॉ शेखर सक्सेना, लखनऊ 

शरीर से रक्त बह रहा था, हथियार गिर गए थे, अश्व मर चुका था, रण के साथी छूट चुके थे और पिछले दो प्रहर से पानी की एक बूँद नहीं मिली थी पीने के लिएI हाथ को हाथ ना सूझे, ऐसी अँधेरी रात में, जंगल में इकलौती झोपडी सामने जलते दिए को देखकर वो ठिठक गयाI मन में आशंकाएं उठीं कि जाने कौन हो उस झोपडी में…कोई साधु, तांत्रिक, ठग या प्रेतलीलाI लेकिन उस झोपडी के सिवाय उस विकट समय में उसे कोई दूसरा सहारा भी नहीं दिख रहा थाI

जब जान पर बनी हो तो आदमी प्रेत, पिशाच किसी से नहीं डरताI हिम्मत करके उनसे झोपडी के सामने पहुँच कर आवाज लगाईंI

अप्रत्याशित रूप से झोपडी का द्वार तुरंत खुलाI

अन्दर से एक कोमलांगी युवती आकर खड़ी हो गयीI

“कौन हो ? क्या चाहते हो?” आयु और अवस्था से विपरीत युवती की आवाज में कड़कपन थाI

“पथिक हूँ, रास्ता भटक गया हूँ…मदद पाना चाहता हूँ”

“तुम्हारे वस्त्रों से तो ऐसा नहीं लगता…सत्य कहो अन्यथा सहायता पाने की आशा छोड़ दो”

“सैनिक हूँ, घायल हूँ…जीवित रहना चाहता हूँ”

“अन्दर आओ” युवती द्वार से एक तरफ हटकर खड़ी हो गयीI

कब वो अन्दर आया, कब उसने होश खोये…उसे याद नहींI

सुबह जब उसकी आँख खुली तो उसके घावों पर मरहम लगा हुआ थाI उसके मस्तक पर शीतल जल से भीगी, कपडे की एक पट्टी रखी हुई थी और युवती उस झोपडी में ही एक तरफ बने चूल्हे पर शायद कुछ जड़ी बूटियां उबालकर काढ़ा बना रही थीI

उसके जागने की आहट पाकर युवती उसकी तरफ पलट गयीI

“अब कैसा स्वास्थ्य है तुम्हारा?”

“आप देवी हैं…आपने मेरे प्राण बचाए हैं, मैं आजीवन आपका प्राणपण से ऋणी रहूँगा”

“यह औषधि पी लो…तुम शीघ्र ही अच्छे हो जाओगे” युवती ने काढ़े का कटोरा उसकी तरफ बढ़ा दियाI

उसने कृतज्ञ भाव से काढ़ा पी लियाI

“आप हैं कौन और इस जंगल में अकेले क्यूँ रह रही हैं?”

“मैं तो एक साधारण वनवासिनी हूँ…परन्तु तुम कौन हो?”

“मैं…मैं श्रीपुर नरेश महाराज रंगनाथ का सैनिक हूँI रत्नागिरी राज्य के साथ हुए युद्ध में हम लगभग विजयी हो चुके थे, रत्नागिरी के सेनापति बलदेव मेरे ही भाले से काल का ग्रास बने थेI परन्तु युद्ध की समाप्ति होने से पूर्व ही दक्षिण दिशा से उनकी नयी टुकड़ी ने हम पर धावा बोल दियाI मेरे साथी मारे गये, अश्व भी मर गया,मेरे शस्त्र छूट गये… आप ना होतीं तो मेरे प्राण भी छूट जातेI आप ने मुझे नया जीवन दिया है”

“रत्नागिरी के सेनापति को तुमने मारा!”

“और क्या…भाले का एक ही प्रहार और अगले ही क्षण वो धूल चाट गए”

“और अब युद्धभूमि से भागे हो, अर्थात युद्धभूमि के भगोड़े हो”

युवती की बात उसके स्वाभिमान को तीर जैसी चुभीI

“भगोड़ा नहीं हूँ…सैनिक हूँI युद्ध में हँसते हुए प्राण दे सकता हूँI युद्धभूमि से भागा ज़रूर हूँ लेकिन केवल अपने प्राण बचाने के लिए नहीं वरन शक्ति एकत्रित कर पुनः युद्ध करने के लिएI युद्ध के नियम जानता हूँ और विजय की नीतियां भी”

“अर्थात स्वस्थ होकर पुनः रत्नागिरी से लड़ोगे?”

“अवश्य…अंतिम सांस तक”

युवती पुनः चूल्हे की तरफ घूम गयीI “जब तक मेरी कुटिया में हो तब तक युद्ध की बातों की आवश्यकता नहीं हैI अपना पूरा ध्यान केवल स्वास्थ्य लाभ पर लगाओ”

कमजोरी की वजह से वो फिर से अचेत हो गयाI

अगले दो दिन में वो अपने आप को पूर्ण स्वस्थ अनुभव करने लगाI युवती ने वस्तुतः अपनी सेवा और औषधियों से उसे समय से पहले ही चलने फिरने और अन्य काम करने के योग्य बना दिया थाI

“मैं अब प्रस्थान करने की आज्ञा चाहता हूँI यदि मैं आपके लिए कुछ कर सकूँ तो कृपया मुझे बताने की कृपा करें”

“तुमने प्राणप्रण से मेरा ऋणी होना स्वीकार किया हैI इससे अधिक कोई किसी को क्या दे सकता है! जाओ अपने मार्ग पर, पूर्व दिशा में प्रस्थान करो…एक दिन की अनवरत पैदल यात्रा के पश्चात् तुम श्रीपुर राज्य की आबादी में पहुँच जाओगे”

“जो आज्ञा” वह चलने को उद्दत हुआI

“तनिक ठहरो” युवती चलने को तैयार सैनिक को रोककर झोपडी के अन्दर गयी और कहीं से एक तलवार और कटार ले आईI “वन में तुम्हारे प्राणों पर संकट आएगा…ऐसी स्थिति में तुम्हें अपनी रक्षा के लिए कोई एक अस्त्र अपने पास रखना चाहिए”

युवती की बात सही थीI जंगल में कदम कदम पर प्राणों का खतरा थाI पूरा जंगल कई तरह के जंगली, भयानक पशुओं, सर्पों से भरा पड़ा थाI युवती ने वह अस्त्र अवश्य ही अपनी रक्षा के लिए रखे थे, पर रत्नागिरी को जीतने के लिए उसे जंगल से जीवित निकलना भी आवश्यक थाI वह पुरुष था… बाहुबल में नारी से अधिक शक्तिशाली, छोटे अस्त्र से भी अपनी रक्षा करने भी सक्षमI

उसने कटार को चुन लिया और झोपडी से निकल कर पूर्व की ओर बढ़ चलाI युवती भी वापस अपनी झोपडी में चली गयीI

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पैदल चलते हुए उसे एक प्रहर का समय बीत चला थाI सूर्य अब उसके मस्तक से ऊपर निकल रहा थाI अचानक “ठहरो” के आदेश ने उसके पांव जड कर दिएI

वन के पेड़ों के पीछे से निकल कर भीलनी की वेशभूषा में, चेहरा ढंके हुए, हाथ में तलवार लिए एक स्त्री उसके सामने आकर खड़ी गयीI

“कौन हो तुम…क्या चाहती हो?” उसने चकित स्वर में पूछाI

“मृत्यु हूँ…तुम्हारी मृत्यु चाहती हूँ”

“तुम्हें कोई भ्रम हुआ है…मैं कोई धनिक नहीं, एक पथिक हूँ…तुम्हें देने के लिए मेरे पास कुछ भी नहीं है”

“तुमने संभवतः ध्यान से नहीं सुना…मैं तुम्हारे प्राण चाहती हूँ” स्त्री ने गुर्राते हुए स्वर में उत्तर दिया और म्यान से तलवार निकालकर उसकी तरफ दौड़ीI

अब वह तीन दिन पहले का घायल, मृतप्राय सैनिक नहीं थाI अब वह अपने प्राणों की रक्षा के लिए किसी के भी प्राण हरने में सक्षम थाI उसका पूरा जीवन, पूरा युद्ध प्रशिक्षण अपने प्राण बचाने और शत्रु के प्राण लेने को ही समर्पित थाI काल का स्त्री या पुरुष रूप में आना उसे विचलित नहीं कर सकता थाI

उसने भी वनवासिनी की दी हुई कटार निकाल ली और स्त्री पर टूट पड़ाI

घात- प्रतिघात के इस लम्बे खेल का अंत उसकी कटार के उस भीलनी के पेट में घुसने से हुआI भीलिनी चीखती हुई एक तरफ़ जा गिरीI वह इस आक्रमण के अंत के बाद अब अचंभित था कि इस बियाबान जंगल में उस पर इस तरह अकारण आक्रमण का उद्देश्य क्या था!

उसने आगे बढ़कर, घुटनों के बल बैठकर भूमि पर गिरी, पीड़ा से छटपटा रही भीलनी के मुख से उसका वस्त्र हटा दियाI हतप्रभ होकर वह पीछे की तरफ गिर गयाI

वह भीलनी, वही वनवासिनी थी जिसने अपनी कटार उसे उसकी प्राणों की रक्षा के लिए दी थीI

“देवी आप!…हे ईश्वर! यह कैसा पाप करवा दिया आपने मुझसे?” उसने वनवासिनी का सर अपने घुटनों पर रख लिया “आपको अगर मेरे प्राण ही लेने थे तो आपने मेरा जीवन क्यूँ बचाया? आप तो तभी मुझे मार सकती थीं जब मैं आपकी झोपडी में घायल, अचेत पड़ा था…आप एक बार कहतीं तो मैं सहर्ष अपने प्राण आपको समर्पित कर देता”

“तब तुम आतिथि थे…घायल थे, शरण में आये थे” वनवासिनी ने अटक अटक कर कहना शुरू किया “शरणागत के प्राण लेना सेनापति बलदेव की पुत्री के क्षत्रिय धर्म के विरुद्ध थाI इसलिए…इसलिए मैंने तुम्हारे प्राण बचाएI लेकिन ठीक होने के बाद…तुम मेरी मातृभूमि पर पुनः आक्रमण करने के लिए तैयार थेI अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए मैं तुमपर आक्रमण कियाI”

“सेनापति बलदेव की पुत्री और वनवासिनी! यह कैसे हुआ?”

“मुझे किसी से प्रेम था…मेरे पिता अपने समाज में उसे स्वीकार नहीं कर सकते थे…इसलिए विवाह के पश्चात् हमने नगर त्याग दियाI मेरे पति को काल खा गया तो मैं वनवासिनी हो गयीI

“पिता के हत्यारे की आप सेवा करती रहीं…उसका जीवन बचाया!”

“मेरे पिता युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए…यह…इस पर गर्व है मुझेI इसके लिए तुमसे कैसा द्वेष?”

वनवासिनी की साँसें अब उखड़ने लगी थीI

“मैं अपने जीवनदायनी देवी को ही आहत कर बैठा…Iहे ईश्वर यह कैसा पाप हुआ मुझसे! मैं…मैं स्वयं को आपकी अंतिम इच्छापूर्ति में बाधा नहीं बनने दूंगाI यह जीवन आपने दिया था, इस जीवन को आपको वापस कर रहा हूँ”

सैनिक ने अपनी कटार वनवासिनी के हाथों में पकड़ा दीI वनवासिनी ने बची साँसे बटोर कर कटार पर अपनी मुठ्ठी बाँध लीI सैनिक ने वनवासिनी की मुठ्ठी पर अपनी मुठ्ठी कस दीI

रत्नागिरी राज्य की मोहर लगी कटार ने सैनिक के गले से रक्त को बाहर निकलने का रास्ता बना दियाI

अनंत काल से शांत खड़े वन के पेड़ कभी नहीं समझ पाए कि सच्चा सैनिक कौन था ?

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