समीक्षा- कागज़ की नाव

उपन्यासकागज़ की नाव
लेखकसुरेन्द्र मोहन पाठक

प्रकाशकवेस्टलैंड

कीमत– 79रुपये

समीक्षकगौरव कुमार निगम

कथासार– लल्लू उर्फ़ लालचंद हजारे धारावी की धरती का वो इंसान है जिसके पास जुर्म करने के लिए चॉइस नहीं है. वो बस अपने जुर्म का स्तर चुन सकता है. उसका सपना है कि दुनिया उसे लल्लू ना समझे और इज्जत से लालचंद हजारे कहकर सलाम करे. इसके लिए वो धारावी के दादा एंथोनी और अली अब्बास की सोहबत शुरू करता है. प्रतीकात्मक रूप से देखें तो जुर्म की दुनिया में हिन्दू, मुस्लिम, इसाई तीनो की पैठ दिखाकर यह बताया गया है कि इस कालिख से कोई नहीं बचा है. लल्लू, एंथोनी और अली के साथ मिलकर बैंक लूट के कारनामे को अंजाम देता है. लूट के बाद अली के सौजन्य से लल्लू की मुलाकात खुर्शीद से होती है जो कि धारावी की ही गलियों में पली बढ़ी वेश्या है.

क्लासिक मोड़ आता है और लल्लू खुर्शीद को अपने घर की बहू बनाने का सपना देखने लगता है.

इलाके का इंस्पेक्टर अष्टेकर कुछ महीने पहले हुए विलियम के क़त्ल के सिलसिले में एंथोनी के पीछे पड़ा हुआ है पर सबूतों की कमी की वजह से कुछ नहीं कर पा रहा है क्यूंकि क़त्ल के वक़्त एंथोनी जेल में था. सख्तमिजाज, रूल बुक में अपने नियम जोड़ देने वाला इंस्पेक्टर अष्टेकर ही विलियम का बाप होता है जिसका पता उसके अलावा सिर्फ विलियम की माँ मार्था को होता है. कभी समाज ही अष्टेकर और मार्था के बीच खड़ा था, कभी लल्लू और खुर्शीद के बीच खड़ा है…वही समाज, वही रिवाज.

एंथोनी की रखैलें उसका और अब्बास का अड्डा इलाके के ही एक उम्र से गए गुजरे लेकिन कांटे के तालातोड़ वीरूदेव के मदद से लूट लेती हैं लेकिन एंथोनी उनका पता लगाकर अपने हाथ से सजा देता है और वीरू को मारने की जिम्मेदारी लल्लू को देता है जिसमें वो अपनी जिन्दा कांशस के चलते फेल होता है और इसी के साथ खुद को एंथोनी की सजा का हकदार बना लेता है.

लल्लू को मारने के चक्कर में खुर्शीद मारी जाती है.

लालचंद फिर धारावी को वही बनकर दिखाता है जैसा एंथोनी था, अब्बास था…बेरहम, दुर्दांत, कातिल.

समीक्षा– उपन्यास पुराना है और सत्तर की दशक की फिल्मों की याद दिलाता है. कहानी का प्रवाह बहुत तेज़ है और कहीं भी बोरियत का एहसास नहीं होने देता है. डायलॉग छोटे छोटे हैं और कहानी के प्रभाव को समुचित ढंग से बयान करते हैं. लल्लू के चरित्र का उत्थान या यूँ कहें कि पतन देखते जाना दिलचस्प है. एक समय में उसके अन्दर इतनी ईमानदारी अभी भी बची हुई है कि ट्रेन में मिले अनजान आदमी के भी पचास रुपये लौटाने का जतन करता है और अंत तक आते आते जानबूझ कर अब्बास को मौत के मुंह में धकेल देता है ,जबकि चाहता तो उसे अष्टेकर को भी सौंप सकता था.

कहानी का अंत द्रवित करने वाला है और बताता है कि ज़ाहिर तौर पर सारे गुनाह करने के बावजूद उसके अन्दर का सीधा इंसान अभी मरा नहीं है. लल्लू से लालचंद बनने के सफ़र के अंत में जब मार्था उससे उसका नाम पूछती है तो वो कहता है, “लालचंद…नहीं जी, मेरा नाम लल्लू है, लल्लू”…खुर्शीद का लल्लूI

रेटिंग– 5/5

 

 



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