सिगरेट की लत

रचनाकार- श्यामली सक्सेना
पहले तो रामानुज जी को यकीन ही नहीं हुआ कि उनके लड़के दिवाकर ने स्मोकिंग शुरू कर दी हैI लेकिन अनुराग बाबू की बात पर यकीन ना करने का कोई कारण भी नहीं थाI फिर भी उन्हें पक्का यकीन तभी हुआ जब अगले दिन ऑफिस से लौटते हुए दिवाकर को नुक्कड़ की दुकान के सामने सिगरेट के कश लगाते हुए अपनी आँखों से देख लियाI
दिवाकर ‘टीन एज’ कही जाने वाली उस उम्र में कदम रख चुका था जहाँ बच्चों को अपने माँ बाप की टोकाटाकी कम ही पसंद आती हैI रामानुज जी के सामने अब समस्या यह थी कि अपने बेटे को सिर्फ नसीहत दे कर रह जाने की जगह या उसे मारे पीटे बिना उसकी सिगरेट पीने की आदत कैसे छुड़ाई जाये?
ऐसे में रामानुज जी ने अनुराग बाबू से ही सलाह लेना उचित समझाI अनुराग बाबू दुनिया देखे हुए आदमी थे और समस्या की जगह उसके हल पर ध्यान केन्द्रित करने वाले लोगों में से थेI अनुराग बाबू ने रामानुज जी को एक सरल उपाय बतायाI
अगले ही दिन रामानुज जी ने दिवाकर को सुबह सुबह तैयार होकर अपने साथ चलने को कहाI
रामानुज जी, दिवाकर को लेकर सबसे पहले फल मंडी गए जहाँ उन्होनें ढेर सारे फल खरीदेI
“पापा…इतने सारे फ्रूट्स का हम क्या करेंगे?”
“आज हम एक अस्पताल में फल बांटने चलेंगे”
रामानुज जी अपने बेटे को लेकर शहर के मेडिकल कॉलेज के ऑन्कोलॉजी डिपार्टमेंट में चले गएI पूरा वार्ड कैंसर के मरीजों से भरा पड़ा थाI किसी का मुंह गला हुआ था, किसी के गले में छेद बना हुआ था, कोई बुरी तरह बीमार हालत में बेड पर लेटा हुआ थाI हर बेड के किनारे उनकी देखरेख के लिए उनके घर के एक दो लोग बैठे हुए थेI कुछ लोग दर्द से बुरी तरह कराह रहे थेI
हर एक चेहरे पर चिंता, दर्द और ग़म थाI
“उफ्फ्फ…बेचारे कितनी तकलीफ में हैं” दिवाकर ने घबराकर रामानुज जी का हाथ पकड़कर कहाI
“बेचारे! बेचारे ये नहीं हैं बेटा…और इन्हें कोई खास तकलीफ नहीं हैI इनमे से ज्यादातर लोग सिगरेट पीने, नशा करने की वजह से कैंसर से पीड़ित हुए हैंI ये कष्ट इनमें से कईयों ने खुद बुलाया हैI हर सिगरेट के पैकेट पर लिखा होता है कि इससे कैंसर हो सकता है, हर दो मिनट के बाद हर टीवी चैनल, रेडियो पर विज्ञापन आते हैं कि सिगरेट पीने से, नशे से आदमी बीमार होता है…लेकिन फिर भी लोग नहीं मानतेI ये वो लोग नहीं हैं जो असली तकलीफ झेलते हैं…आओ तुम्हें उन लोगों से मिलवाता हूँ जो इस बीमारी के असली शिकार होते हैं”
रामानुज जी दिवाकर को लेकर बाहर कंपाउंड में आ गए जहाँ कई लोग दो दो चार चार के ग्रुप में बैठे हुए थेI ज्यादातर लोग मध्यमवर्गीय परिवार के लग रहे थेI ऐसी लग रहा था जैसे बहुत सारे लोग एक बड़े प्लेटफार्म पर अपनी सुख की ट्रेन के आने का इंतजार कर रहे होंI
“इन लोगों को देख रहे हो मेरे बच्चे…ये लोग हैं इस बीमारी के असली शिकारI कैंसर का असली शिकार बनता है रोगी का परिवारI इन लोगों को देखो…इनमे से कई लोग अपनी जिन्दगी भर की सेविंग खर्च करके अपने रोगी को बचाना चाहते हैं, कई लोग अपने जेवर, घर, खेत बेच कर इलाज करा रहे हैं, कई लोगों पर ऐसा कर्जा चढ़ा होगा जिसे चुकाते चुकाते उनकी जिन्दगी बीत जायेगी…पर फिर भी शायद ही रोगी को बचा पायें क्यूंकि कैंसर एक ऐसा रोग है जो अक्सर नोटिस में तभी आता है जब उसकी स्टेज इलाज के काबिल नहीं रह जाती…रोगी तो मरकर मुक्त हो जाता है, कई बार ठीक भी हो जाता है लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में उसका परिवार आर्थिक, मानसिक स्थिति में दसियों साल पीछे चला जाता है”
“ओह्ह”
“जाओ बेटा…अपने हाथों से इन लोगों को फल बाँट आओ, मैं गाड़ी में तुम्हारा इंतजार कर रहा हूँ”
दिवाकर ने धीरे धीरे सारे फल कंपाउंड में बैठे लोगों में बाँट दिए और वापस कार में आकर बैठ गयाI रामानुज जी ने कार करने के लिए हाथ बढ़ायाI
“पापा…मैं आपसे कुछ कहना चाहता हूँ…पिछले कुछ दिनों से मैंने भी सिगरेट पीनी शुरू कर दी थी, लेकिन अब मैं जान गया हूँ ऐसा करके मैं ना सिर्फ अपनी जिन्दगी के साथ खेल रहा हूँ बल्कि आपकी और मम्मी के दुःख का कारण भी बन जाऊंगाI आई एम सॉरी पापा”
रामानुज जी ने दिवाकर को गले लगा लिया, वो अपने बेटे को कैंसर के भयावह सच से वाकिफ कराना चाहते थेI दिवाकर को अब सिगरेट की चमकीली डिब्बियां मौत के खिलोने लग रहे थेI

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