हिंदी की दस कालजयी रचनाएँ जो हर किसी को पढनी चाहिए

रचनाकार- गौरव निगम 

23 अप्रैल को World Book Day-2017 अर्थात विश्व पुस्तक दिवस हैI UNESCO (United Nations Educational, Scientific and Cultural Organization) ने सन 1995 में William Shakespeare और Inca Garcilaso de la Vega की मृत्यु तिथि २३ अप्रैल को World Book Day रूप में मनाने का फैसला लिया थाI

पाठकों और किताबों को समर्पित यह त्यौहार आज करीब सौ देशो में मनाया जाता हैI

आइये इस दिन बात करते हैं हिंदी की उन दस कालजयी किताबों की जिनकी लोकप्रियता आज भी पढने वालों के बीच पहले की ही तरह मौजूद हैI

गबन-

मुंशी प्रेमचंद अपने वक़्त के उन रचनाकारों में से थे जो उस दौर के लोगों की मानसिकता को बड़ी बेबाकी से अपने पढने वालों के सामने रख देते थेI समाज और उसकी मानसिकता को प्रेमचंद से बेहतर रचने में शायद ही किसी ने सफलता पायी होI गबन कहानी है रामनाथ नामक एक ऐसे नौजवान की जिसे सामाजिक और पारिवारिक दबाव में अपने नैतिक मूल्यों के ढहते किले से बाहर निकलना पड़ता है और वो काम करने पड़ते हैं जिसे कभी वो खुद ही नकारने को तत्पर रहता थाI

सन 1931 में प्रकाशित यह उपन्यास आज भी हिंदी साहित्य आकाश का चमकदार सितारा हैI

गोदान

सन 1936 में हिन्दी ग्रन्थ रत्नाकर कार्यालय, बम्बई से प्रकाशित मुंशी प्रेमचंद जी द्वारा रचित यह उपन्यास उनकी सर्वोत्तम रचना मानी जाती है और आज भी पुस्तक मेलों में सबसे ज्यादा बिकती हैI किसान वर्ग का चेहरा बना इस उपन्यास का नायक ‘होरी’, और गोदान की कहानी आज भी भारत में प्रासंगिक बनी हुई हैI एक किसान की निराशा, बेबसी और जिजीविषा को उकेरने में मुंशी प्रेमचंद जी ने कलम तोड़ दी हैI

1963 में इस उपन्यास पर आधारित फिल्म भी बनी थी जिसमें राजकुमार, महमूद और शशिकला जैसे कलाकारों ने अपनी चमक बिखेरी थीI

गुनाहों का देवता-

कहने को गुनाहों का देवता एक स्टूडेंट की अपने ही कॉलेज प्रोफेसर की बेटी से प्रेम कर बैठने की कहानी है लेकिन सन 1949 से आज तक धर्मवीर भारती जी का यह उपन्यास पाठकों, खासकर तीस से कम उम्र के शहरी और कस्बाई पुरुष पाठकों में अतिलोकप्रिय हैI

प्रेम को पाने और समाज के नियमों के द्वंद में फंसे चंदर और सुधा उस सरल प्रेम के प्रतीक बन गए हैं जहाँ मिल जाना, साथ रहना ही प्रेम की कसौटी नहीं होती हैI सन 1967 में इस उपन्यास पर एक फिल्म भी बनी थी जिसमें जीतेंद्र और राजश्री ने चंदर और सुधा की भूमिका को जीवंत किया थाI

कितने पाकिस्तान-

सन 2000 में प्रकाशित भारत- पाकिस्तान विभाजन की पृष्ठभूमि में लिखे गये इस उपन्यास ने कमलेश्वर जी को अप्रितम ख्याति दिलाईI

सन 2003 में साहित्य अकादमी अवार्ड से सम्मानित इस रचना में इतिहास के कुछ प्रमुख हस्तियों की एक काल्पनिक न्यायालय में पेशी होती है जहाँ वो इतिहास और उसकी घटनाओं का अपनी समझ के अनुसार वर्णन करते हैंI

इसकी लोकप्रियता की वजह से इसे मराठी, फ्रेंच और अन्य भाषाओँ में भी अनुवादित किया गयाI

मधुशाला-

हरिवंशराय बच्चन की लिखी मधुशाला जब सन 1935 में प्रकाशित हुई थी तो इसकी लोकप्रियता का आलम यह था कि इसे हरिवंश राय बच्चन से सुनने के लिए लोग ठण्ड में भी रात रात भर कवि सम्मेलनों में जमे रहते थेI

शराब की प्रशंसा के आरोप के बावजूद इस रचना की अहमियत इस बात से लगाई जा सकती है कि इसे सुनने के बाद स्वयं महात्मा गाँधी जी ने इसकी आलोचना को अकारण बताया थाI

रश्मिरथी-

रश्मिरथी महाभारत के उस पात्र की कहानी कहती है जिसे सबसे ज्यादा उपेक्षित किया गयाI नायक और खलनायक के पाले में इधर उधर धकेले जाते कर्ण को सदैव उसकी माता कुंती और उसे ‘कुंतीपुत्र कर्ण’ के नाम से जाना जाता है, क्यूंकि समाज ने उसके पिता की पहचान को उसका अपयश का कारण साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थीI

1935 में प्रकाशित रामधारी सिंह दिनकर की यह रचना अन्य भाषाओं में भी अनुवादित हो चुकी हैI

राग दरबारी-

सामाजिक और राजनैतिक व्यवस्था पर कटाक्ष के रूप में यह रचना श्रीलाल शुक्ल जी की सबसे प्रसिद्द रचना हैI सन 1968 में प्रकाशित यह उपन्यास आज भी हिंदी साहित्य में मील का पत्थर हैI

स्वास्थ्यलाभ के लिए गाँव आये उच्चशिक्षित नौजवान रंगनाथ के आदर्शों और वास्तविक दुनिया के दांव-पेंचों के बीच के कसमसाहट को बखूबी रचा है श्रीलाल शुक्ल नेI व्यापारी, अपराधी, पुलिस और नेताओं के गठजोड़ को दर्शाती इस रचना को 1969 में साहित्य अकादेमी अवार्ड से नवाजा गया थाI

मैला आँचल

पदमश्री से सम्मानित फणीश्वर नाथ रेनू की मैला आँचल नामक यह रचना भारत छोडो आन्दोलन की पृष्ठभूमि में बिहार की एक छोटी सी जगह पर बसे कुछ लोगों की कहानी है जो अपने वक़्त के समाज और परिस्थितयों से जूझ रहे हैंI

सन 1954 में प्रकाशित फणीश्वर नाथ रेनू की यह पहली रचना थी और यह इतनी प्रसिद्ध हुई कि इसे कई जगह हिंदी भाषा के पाठ्यक्रम में शामिल किया गया हैI

तमस- 

तमस वस्तुतः पांच दिनों की कहानी है जब आज़ादी के वक़्त साम्प्रदायिकता और इंसानों के अन्दर दबी हैवानियत चरम पर थीI

भीष्म साहनी बंटवारे के गवाह थे और उनकी यह पीड़ा तमस में बाहर निकल कर आती हैI भीष्म साहनी को सन 1973 में प्रकाशित इस रचना के लिए साहित्य अकादमी अवार्ड से नवाजा गया और इस पर बाद में गोविन्द निहलानी के निर्देशन में फिल्म भी बनी जिसमे ओम पुरी जैसे दिग्गज कलाकार ने काम किया थाI

काशी का अस्सी-

रामजन्मभूमि आन्दोलन और मंडल कमीशन जैसी चर्चित घटनाओं से पिरोई हुई यह रचना बनारस को एक पात्र के तौर पर पेश करती हैI हर बात, घटना, पात्र, संवाद के ऊपर ठेठ बनारसी छाप है जो इसे एक अलग रंग देती हैI यह बनारस को काशी या वाराणसी नहीं बल्कि सिर्फ बनारस की तरह देखती हैI

2002 में काशीनाथ सिंह के द्वारा रचित इस उपन्यास पर सनी देओल को लेकर अभी कुछ साल पहले एक फिल्म भी बनी थी जिसे इसमें दिखाई गई बातों की वजह से प्रतिबंधित कर दिया गया थाI

हिंदी रचनाओं का संसार विशाल है और इसमें नित नए सितारे जुड़ रहे हैं लेकिन इसमें इतनी सारी उत्कृष्ट रचनाएँ हैं जिन्हें किसी एक लेख में नहीं बाँधा जा सकता हैI

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