हिंदी जासूसी साहित्य का इतिहास

रचनाकार – डॉ कँवल शर्मा 

डॉ कँवल शर्मा हिंदी जासूसी साहित्य के सबसे तेज़ी से उभरते हुए लेखक हैं। अभी तक सिर्फ तीन उपन्यास वन शॉट, सेकंड चांस, टेक थ्री लिखकर ही इन्होंने हिंदी जासूसी सहित्य के पाठकों के दिल में अपनी जगह पक्की कर ली हैं।
यहाँ यह बात भी दिलचस्प है कि इनके हर उपन्यास में किसी न किसी रूप में अंकों (1,2,3) का इस्तेमाल हुआ है।
डॉ कँवल शर्मा के लिखे हुए नावेल कई ऑनलाइन प्लेटफॉर्म और भारत के तकरीबन हर शहर में उपलब्ध हैं।

 

फिरंगी यूरोपियन मुल्कों में लिखी-बोली जाती लगभग तमाम ज़ुबानों में जासूसी कथानकों और उनके लेखकों की एक खूब लम्बी और खूब स्थापित परम्परा है. इसमें ‘हु डन ईट’ मार्का कथानकों के पहले सुपरस्टार लेखक आर्थर कॉनन डायल हैं तो आगे उंसी लिस्ट में सेक्स्टन ब्लैक, अगाथा क्रिस्टी हैं तो वहीँ मौजूदा दौर में उस मशाल को जिलाएँ रखने वाली पी.डी. जेम्स और स्यु ग्राफ्टन भी हैं. इन सभी लेखकों – लेखकिकाओं का वहाँ एक अपना एक खूब ऊंचा मुकाम, एक अलग रसूख है जिसकी मिसाल इस बात से मिलती है कि हाल ही में जब स्यु ग्राफ्टन साहिबा की वहाँ ब्रिटेन में मौत हुई तो उनको श्रद्धांजलि देने वालों की लम्बी फेहरिस्त में वहाँ के तत्कालीन प्रधानमन्त्री श्रीमान डेविड कैमरून साहब भी थे जिन्होंने अपने शोक सन्देश में जासूसी कथानकों की इस लेखिका को एक बेमिसाल शख्सियत और लाजवाब लेखिका बता उन्हें महानता के उच्चतम सीढ़ी पर बैठाकर ये तक कह दिया कि इनके लिखे महान (जासूसी) कथानक आगे आने वाली पीढ़ियों को भी प्रेरणा देते रहेंगे.
साहेबान – गौर कीजिये कि महानता का ऐसा बेमिसाल और काबिले रश्क दावा इन लेखिका साहिबा का तब है कि जब इन्होने अपने पूरे लेखन काल कुल मिला कर केवल उन्नीस कथानक रचे हैं. लेकिन चूंकि वो इंग्लैंड है तो वहाँ उनका जासूसी कथानकों के दम पर ऐसी किसी सुलेमानी कद पर दावा बनता है.
और फिर इंग्लैंड ही क्यूँ !!
और सिर्फ अंग्रेजी ही क्यूँ !!

हालिया सालों में स्टेग लार्सन और जो नेस्बों ने अंग्रेजी के इतर दूसरी यूरोपीय भाषाओं में ऐसी ही ऐय्यारी दास्ताने लिखी और खुद को महान, महानतम जासूसी लेखकों में शामिल करवा लिया. इधर अभी जापान में भी कई लेखकों ने अपने गढे कई जासूसी कथानकों के दम पर खूब ऊंचा मुकाम हासिल किया और बदले में कई नामवर पुरस्कारों से नवाजे गए.
एक ऐसी विधा जिसे दुनिया भर में बेहद इज्ज़त से देखा जाता है और जिसके रचयिताओं को खूब ऊंचे और बेमिसाल उपलब्धियों से लाद दिया जाता है फिर उसी सन्दर्भ में हमारे यहाँ हिंदी में इस विधा का क्या हाल है !!
हमारे सन्दर्भ में हिंदी – उर्दू में इस किस्म के लेखन के बिलकुल शुरूआती नामों में गोपालराम गहमरी और किशोरीलाल गोस्वामी का नाम आता है लेकिन फिर ये भी एक सच है कि उनके लिखे वो किस्से इन पंक्तियों के लेखक खुद कभी नहीं पढ़े और यूँ इस सन्दर्भ में उसने भी इन लेखकों का केवल नाम भर सुना है. बहरहाल सुनी सुनाई बातों के दम पर ही ये लिखा जा सकता है कि जासूसी कथानकों के तौर पर आये इनके किस्से आम जनता में कोई ख़ास जड़ न पकड़ पाए और बहुत जल्द ही उन्हें बाज़ार में सामाजिक उपन्यासों की आंधी ने उखाड़ दिया. इनके बाद फिर कुछ और नाम आये और उन्ही नामों में से नाम हिंदी साहित्य में खूब ऊंचे पायदान पर स्थापित श्री देवकी नंदन खत्री जी का भी है जिनके लिखे ‘चद्रकान्ता सन्तति’ ने ऐय्यारी दास्तानों में शायद सबसे पहले इज्ज़तदार नाम कमाया. आगे इनका लिखा ‘भूतनाथ’ भी खूब पसंद किया गया लेकिन – जैसा कि माना जाता है – इसके कुछ आखिरी हिस्से श्री देवकी नंदन खत्री साहब के बेटे श्री दुर्गा प्रसाद खत्री जी ने ही लिखे थे.
वैसे इस सन्दर्भ में एक सवाल हमेशा रहेगा कि यहाँ उन्होंने जो लिखा क्या उसे शुद्ध ‘जासूसी’ कथानकों के सिलसिले में गिना जाए ! उनके लिखे ये कथानक एक काल्पनिक रूमानी दुनिया की दास्तान थी जिसमे खलनायक किरदार अपने कुकर्मों से नायक – नायिका की नाक में दम किये रहता था. एक ऐसी काल्पनिक सृष्टी के ऐसे समाज में किन्ही ऐसे किरदारों के सहारे रचे गए किसी भी कथानक को कम से कम मौजूदा दौर की नुक्ते-निगाह से देखने पर उन्हें पूरी तरह ‘जासूसी कथानकों’ वाली जमात में रखना – ज़रा मुश्किल है.
वैसे तो इस विधा में पहले पहल लिखने वालों में ज़फर उम्र साहब साहब, मिर्ज़ा मुहम्मद हादी रुस्वा तीरथराम फिरोज़पूरी और नदीम सहबाई साहब के भी नाम हैं लेकिन इनमें से ज़्यादातर ने उर्दू में ही लिखा – और शायद ख़ास इसी वजह से इस किस्म की किताबों का कोई बाज़ार खड़ा न कर सके – और फिर आगे यूँ इनके लिखे ने खुद इनके लिए भी कोई ख़ास मुकाम न दिया.
लेकिन आगे आने वाले वक़्त के साथ ये पूरी इक्वेशन तब बदल गई जब इस विधा में तब के एक नए लेखक ने अपने हाथ अजमाए और बेहतरीन कामयाबी हासिल की. ये वो पहले शख्स थे जिन्होंने ऐसी ऐय्यारी दास्ताने लिखकर अपने नाम का कोई कद, कोई वजूद खड़ा किया किया था – और ये थे असरार अहमद साहब जिन्होंने अपने बेमिसाल कैरियर में पहले-पहल तो असरार नारवी, सनकी सोल्जर, और तुगरल फर्गान जैसे नामों से ग़ज़ल वैगरह लिखी लेकिन बाद में आगरा से निकलने वाली ‘जासूसी दुनिया’ से इब्ने सफी के नाम से लिखने लगे.
अब ये एक आम माना जाता है कि इस किस्म के कथानकों में इब्ने सफी साहब दरअसल न सिर्फ पायोनीयर थे बल्कि इस विधा को अपने आप में एक खूब ऊंचे और इज्ज़तदार मकाम पर ले जाने वाले सबसे पहले लेखक भी थे. हालंकि उनके उस दौर में उनके अलावा कुछ अन्य लेखक – जैसे एम.एल.पाण्डे साहब या फिर इस किस्म की कहानियां ‘भयंकर भेदिया’ या ‘भयंकर जासूस’ मार्का नामों के साथ आते लेखक – भी थे जो इस विधा में लिख रहे थे. इब्ने सफी साहब के बारे में ख़ास सुयोग ये ज़रूर रहा कि उनके इस किस्म के कथानक हिंदी के साथ साथ उर्दू में भी प्रकाशित होते थे जबकि बाकी के केवल हिंदी में. यूँ जहां सफी साहब को हिंदी – उर्दू दोनों के पाठक हासिल थे वहीँ बाकियों को केवल हिंदी के और शायद यह भी एक वजह थी कि उस दौर में इब्ने सफी साहब अपने समकालीन लेखकों में कहीं आगे बने रहे. सफी साहब के ऐसे ज़ोरदार आगमन के बाद इस विधा की कहानियों की बाज़ार में मांग ज़रूर बढ़ी लेकिन फिर इसके बावजूद भी ऐसा कहना कि इस किस्म की विधा ने समाज में अब अपना कोई मुकाम बना लिया था – गलत ही होगा.
यहाँ हिंदी में ऐसे कथानकों का कायदे का सम्मान या कहें लोकप्रियता तब शुरू हुई जब दिल्ली की एक कपड़ा मिल में कार्यरत मजदूर वर्ग का प्रतिनिधित्व करने वाले ओ.पी.शर्मा साहब ने इस विधा को पकड़ा. मूल रूप से शर्मा जी तब अपने मजदूर साथियों के मनोरंजन के लिए अपनी दिन भर की नौकरी के बाद शाम को बैठकर लिखते थे. अपने ख्यालातों में उनका झुकाव तब वामपंथ की ओर था और इसीलिए उनके लिखे कई कथानकों में भी उस प्रभाव को साफ़ तौर पर पकड़ा जा सकता है. आगे चलकर ओ.पी.शर्मा जी दिल्ली से मेरठ आ बसे और अब इस विधा में बाकायदा ‘जनप्रिय लेखक’ ओम प्रकाश शर्मा के नाम के साथ लिखने लगे थे. शर्मा जी सही मायनों में – अपने दौर के तब सबसे बड़े सितारा थे. उनका इस धंधे में – जो अब इस किस्म की कहानियों को हाथों हाथ ले रहा था – रुआब कुछ ऐसा था कि तब उस दौर में उनके मेरठ वाले निवास पर लगभग रोज़ शाम तमाम किस्म के लोगों का जमवाड़ा जुड़ता था जिसमे कई कई फार्मों के प्रकाशकों के अलावा कई बड़े- खूब बड़े, दरम्याने और उभरते हुए लेखकों की की एक लम्बी फ़ज हुआ करती थी. इस भीड़ में शामिल हर शख्स की तब शर्मा जी से एक अलग, एक निजी ज़रुरत हुआ करती थी जिसे कि वो कई बार अपनी हद से बहारा जाकर भी पूरा किया करते थे.
मुलहायज़ा कीजिये –
एक बार एक प्रकाशक शाम में जुड़ते उस मेले में पहुंचा और ओम प्रकाश जी से करबद्ध प्रार्थना करते हुए बोला कि उसकी लड़की की शादी तय हो गयी है लेकिन उसके पास पैसों का इंतज़ाम नहीं हुआ है. बताते हैं कि प्रकाशक की इस आह पर शर्मा जी ने तब अपनी एक नवीनतम रचना – जिसे उन्होंने अभी पिछले रोज़ ही लिखकर पूरा किया था – को यूँ ही उस प्रकाशक को पकड़ा दिया कि इसे छापो और हासिल पैसे से अपनी बेटी की शादी कर लो. गौर तलब है कि उस दौर में ओम प्रकाश जी इस धंधे में सर्वोच्च थे – ऐसे कि जिनकी किसी भी नई रचना की तब कोई एक लाख प्रतियां छपती ही छपती थीं.
हर शाम वहाँ जुड़ते उस संगम में अक्सर कई उभरते लेखक भी वहाँ आ पहुँचते थे कि शायद लोगों की भीड़ में से किसी प्रकाशक से उनकी भी कोई बात कोई डील बन जाए और यूँ उनकी भी कोई रचना छप जाए. कितनी ही बार ऐसा हुआ कि जब किसी प्रकाशक ने शर्मा जी से उनकी लिखी कोई रचना मांगी तब उन्होंने किसी नए उभरते लेखक का हवाला दिया और प्रकाशक को बाकायदा नए लेखक की सिफारिश कर प्रकाशक पर उसे छापने का दबाव बनाया. ऐसे ही एक सिलसिले में एक यादगार और खूब मजेदार किस्सा भी है.
ये वो दौर थे कि जब तमाम प्रकाशक हर महीने अपना नया सेट निकालते थे और अक्सर उस अगले सेट में आने वाली किताबों की जानकारी अपने वर्तमान सेट के पीछे ही दे दिया करते थे. उपन्यासों के पीछे – अक्सर आखिरी – वरके में वो अगले सेट की किताबों के नाम दिस्क्लोज़ करते थे लेकिन हाँ उनके लेखक के नाम नहीं बताये जाते थे. एक बार हुआ ये कि एक प्रकाशक था जिसका पूरा सेट छपकर बाज़ार में जाने को तैयार था लेकिन उस सेट में एक प्री-अन्नाऊंसड टाइटल अभी तक उसके पास नहीं था. अब हाल ये था कि प्रकाशक एक ऐसी स्क्रिप्ट की तलाश में था जिसे वो उस पूर्व घोषित टाइटल के साथ अपने लगभग तैयार सेट में निकाल सके. इस मुकाम पर खड़े उस प्रकाशक को किसी ऐसे लेखक की तलाश उस ओम प्रकाश शर्मा शर्मा जी के द्वारे ले गयी जहां जुड़ते हर शाम वाले उस मेले में तब दिल्ली से आये कुछ लोग भी थे. उन्ही लोगों में तब उनके साथ एक नए लेखक महोदय भी थे जो फिलहाल इस धंधे में अपने पैर तलाशने की कोशिश में थे. बताते हैं कि तब वहाँ उस लेखक महोदय को वो प्रकाशक टकराया जिसने लेखक – जिनकी तब तक एक भी रचना प्रकाशित नहीं हुई थी – को स्क्रिप्ट लिखने का काम ये कहकर दिया कि एक तो वो तय स्क्रिप्ट उसे अगले तीन दिन में लिखकर देगा और कि वो स्क्रिप्ट उस पूर्व घोषित टाइटल के साथ ही छापी जायेगी.
गोया कथानक कुछ भी हो, कथानक का टाइटल ‘पुराने गुनाह, नए गुनेहगार’ ही रहेगा.
आगे फिर जो हुआ वो इतिहास बन गया.
तो साहेबान – सही मायनों में ऐसे कथानकों के साथ खुद को शीर्ष पर स्थापित कर सामाजिक स्वीकार्यता दिलाने वाले पहले लेखक शायद ओम प्रकाश शर्मा जी ही थे. हाल ये था कि तब उनके लिखे अफसानों में ‘राजेश जगत’ सीरिज़ की ऐसी धूम थी कि उसकी खलेआम नक़ल की जाती थी. बहरहाल अगर वो तब शीर्ष पर थे तो उसी पायदान पर तब उनके ज़रा नीचे, ज़रा अगल-बगल कई दूसरे लेखक भी थे और इसमें भी अकरम इलाहबादी साहब और उनकी लिखी ‘खान-बाले’ सीरिज़ का एक अलग ही मुकाम होता था. फिर इसी परमपरा में तब आगे जो कुछ नाम जुड़े जिनमें से ख़ास काबिले ज़िक्र वेद प्रकाश कम्बोज साहब हैं जिनकी लिखी ‘विजय-रघुनाथ’ सीरिज़ का बताते हैं कि एक अलग ही बाज़ार हुआ करता था. इस लिस्ट में तब कर्नल रंजीत के पेन-नेम से लिखते मकबूल जालंधरी साहब भी थे जिनके लिखे कुछ अफ़साने तो आज भी बड़े चाव से पढ़े जाते हैं. फिर विनय प्रभाकर साहब, एस.सी.बेदी साहब, परशुराम शर्मा जी जैसे कई दूसरे लेखकों ने भी अपनी प्रतिभा दिखाई. तो जनाब – कहना ये है कि इब्ने सफी साहब ने जिस विधा को तब बीज की तरह ज़मीन में डाला उसके खिलने पर उसकी आगे की देखभाल इन लेखकों ने की.
और क्या खूब की.
बहरहाल इसके बावजूद जो एक बात अलग से मेंशन की जानी चाहिए वो ये है कि इन सभी मानद लेखकों ने अपने अपने लेखन काल के अलग अलग मुकामों पर जो भी जासूसी उपन्यास रचे वो शायद मौजूदा दौर के शुद्ध जासूसी उपन्यासों की श्रेणी में न आ पायें. उनके लिखे अफ़साने अक्सर उस केटेगरी में आते थे जिसे दरअसल ‘सामाजिक-जासूसी’ उपन्यासों की संयुक्त ब्रीडिंग का नतीजा माना जा सकता है. यानी कहानी में जासूस होता था, उसकी देशभक्ति होती थी और इस कहानी के साथ अक्सर ऐसे किरदारों की चाशनी मिलाई जाती थी जो उस कहानी में ‘सामाजिक’ टच पैदा कर सकें. इसके लिए कभी-कभी मुख्य किरदार की मां के साथ उसके खूब लम्बे-लम्बे डायलॉग लिखे जाते थे या फिर कहानी में किसी मासूम अबला से सबला बनने की दास्तान जोड़ दी जाती थी. पूरा फलसफा कुछ यूँ गढ़ा जाता था कि एक और जहां कहानी में मुल्क की सुरक्षा में लगे काबिल नौजवानो का एक जोड़ा होता था तो दूसरी ओर उसनके सामने एक ऐसा खलनायक खड़ा दिखता था जो पूंजीवाद की देन था और जो अपने निजी लाभ के लिए पूरे समाज को मुसीबत में धकलने के लिए बेचैन रहता था और कि लगभग हर खलनायक अपने आर्थिक फायदे के लिए पूरे समाज और पूरे मुल्क के खिलाफ खड़ा दिखता था.
इन जासूसी कथानकों को लिखते रहे कई लेखकों ने तब कई फिरंगी कहानियों से भी प्रेरणा ली और इस लिस्ट में तत्कालीन दौर के इब्ने सफी साहब भी शामिल हैं जिनकी लिखी शुरूआती कहानियों में से पहला कथानक ‘दिलेर मुजरिम’ विक्टर गन की ‘आयरन साइड्स लों हैंड’ से प्रेरणा लेता है तो वहीँ उनकी लिखा एक अन्य कथानक ‘पहाड़ों की मलिका’ राईगार्ड हैगर के खूब मकबूल उपन्यास ‘किंग सोलोमन्स माइंस’ से प्रेरणा पाता दिखता है.
और ऐसा सिर्फ इब्ने सफी साहब के साथ नहीं था. कर्नल रंजीत के पेन नेम से लिखते लेखक की कितने ही किस्से अंग्रेजी की कुछ बेहतरीन कहानियों से मिलते हैं. उस दौर से लेकर मौजूदा दौर तक लगभग हर लेखक ने अपने जासूसी कथानकों के लिए कभी न कभी किसी न किसी फिरंगी लेखक की किसी अंग्रेजी किताब प्रेरणा लिया ही है लेकिन बावजूद इसके एक बात को नकारा नहीं जा सकता कि ऐसा करके इन लेखकों ने जहां बेहतरीन विश्व साहित्य को हिंदी के पाठकों के लिए पेश किया वहीँ उन्होंने उन कथानकों में से फिरंगी तत्त्व को छांटकर अलग किया, उसे बेझिल अनुवाद की धारा बनने से रोका और तत्कालीन भारतीय परिपेक्ष्य में रखकर पेश किया.
और ये एक उपलब्धि है.
आगे जब एक बार ये धारा पाठकों में स्थापित हो गयी तब इसमें कई दूसरे लेखकों ने भी अपनी हिस्सेदारी की जिनमे जे.एस.वालिया साहब थे, प्रकाश भारती थे तो ‘देवराज चौहान’ सीरिज लिखने वाले अनिल मोहन साहब भी थे. फिर इसी लिस्ट में स्वर्गीय वेदप्रकाश शर्मा जी भी थे जिन्होंने अपने किस्सों में जासूसी कहानियों के साथ सामाजिक समीकरणों का ऐसा कॉकटेल बनाया जिसने उनके लेखन काल में उन्हें इस किस्म की कहानियों के लेखको की लिस्ट में ज़्यादातर सालों में टॉप पर बनाए रखा.
साहेबान गौर कीजिये ऊपर ज़िक्र किये गए तमाम नामों में एक नाम मैंने ख़ास तौर पर नहीं लिखा और वो इसलिए कि उस नाम का ज़िक्र मैं अलग से काना चाहूँगा. वो नाम जिसने अपने लेखनकला से कई पीढ़ियों को अपना मुरीद बनाए रखा है और कि जिनके लिखे कारनामों का एक अलग से पैरा बनता है.
श्रीमान सुरेन्द्र मोहन पाठक साहब जो मौजूदा पकिस्तान के —– वाले हिस्से में सन — में पैदा हुए और जालंधर के कॉलेज से शिक्षा लेकर दिल्ली आ बसे थे ने इस विधा को एक अलग ही ऊंचाई दी. ये उनका ही कमाल था कि समाज का वो तबका जो एलीट था, पढ़ा लिखा था और अक्सर अंग्रेजी कहानियों में पनाह पाता था ने भी हिंदी जासूसी उपन्यासों को इज्ज़त की नज़र से देखना शुरू किया. पाठक साहब ने जो लिखा वो एक अलग ही दास्तान है लेकिन यहाँ कुछ न लिखते हुए भी ये तो लिखना ही पडेगा कि जासूसी कहानियों में कई ‘फर्स्ट एवर’ उन्ही के खाते में आते हैं. पाठक साहब वो पहले लेखक थे जिन्होंने कोई छह दशक पहले एक पत्रकार को जासूस जैसे काम करते दिखाया. मेरे एक बार इस बारे में पूछने पर उन्होंने इस पर कुछ यूँ कहा था –
“उस दौर में जब मैंने लिखना शुरू किया तब ‘हूडनईट’ कथानकों के नायक के तौर पर कोई इंस्पेक्टर हुआ करता था, कोई फौज का रिटायर्ड कर्नल हुया करता था या अक्सर कोई वकील होता था. मैंने जब लिखना शुरू किया तब खुद को अलग दिखाने की कोशिश में मैंने अपने नायक को पुलिसवाला, फौजी या वकील दिखाने से बचते हुए उसे एक पत्रकार दिखाया. हालांकि मेरी उस तब की कोशिश की कोई ख़ास हौंसलाअफजाई तो नहीं ही हुई उलटा धंधे के कई तत्कालीन मठाधीशों ने ये ज़रूर कहा कि – लो कभी पत्रकार भी जासूस होता है !! बावजूद इस आलोचना के मैंने अपने नायक को पत्रकार लिखना जारी रखा.. लेकिन देखिये आज कोई छह दशक बाद ‘इन्वेस्टीगेटिव जर्नलिज्म’ एक आम टर्म बन गई है”
पाठक साहब का ऐसा ही एक दूसरा ‘फर्स्ट एवर’ किस्सा उनका दूसरा नायक है जिसे उन्होंने शुरू शुरू में जेल से भाग निकला एक मुजरिम दिखाया था, जो अक्सर किसी गैर कानूनी काम में शामिल हो अपने किसी मिशन को अंजाम देता था लेकिन फिर भी भीतर से कहीं अपने किये गुनाहों पर शर्मिन्दा दिखता था. पाठक साहब का लिखा ‘विमल’ इस धंधे में उस मुकाम पर पहुंचा जिसे हासिल करना किसी भी दूसरे लेखक के लिए अब सिर्फ एक सपना है. पाठक साहब ने इस बाबत अपने लिखे एक लेख में खुद बताया है कि कैसे उनके लिखे ‘विमल’ को तब ये कहकर नीचा दिखाया गया कि क्यूँकर जेल ब्रेक में शामिल रहा एक स्थापित मुजरिम नायक हो सकता है लेकिन फिर धीरे धीरे उनके इस किरदार ने न सिर्फ अपने आलोचकों को मुतमईन किया बल्कि अपनी ऐसी वाह-वाह कराई जो आज तक इस धंधे में अतुलनीय है, अप्राप्य है. आज भी पाठक साहब लिख रहे हैं और बेहतरीन लिख रहे हैं. उन जैसा किसी ने न उनसे पहले लिखा, न उनके दौर में लिख सका और न आगे किसी के लिखने की कोई उम्मीद दिखती है. आज पाठक साहब ने ‘विमल’ और ‘सुनील’ के अलावा हालांकि एक जासूस ‘सुधीर कोहली’, एक वकील ‘मुकेश माथुर’ और ‘विमल का अंडर स्टडी’ तालातोड ‘जीत सिंह’ सीरिज़ भी अपने नाम कर ली है और ये सभी – ख़ास तौर पर जीत सिंह सीरीज़ – मौजूदा दौर में इस किस्म की कहानियों में सबसे ज़्यादा पसंद किये जाते किरदारों में से एक है.
यकीनन पाठक साहब ही वो शख्स हैं जिन्होंने जासूसी कहानियों को वो मुकाम दिया कि जिसमे एलीट तबका भी इन्हें न सिर्फ पढता था बल्कि पढ़कर रोमांचित भी होता था.
बहरहाल ऐसे में इस पूरे धंधे ने सन अस्सी के दशक से लेकर अगले दस पंद्रह सालों तक बेमिसाल ऊंचाइयां देखी और हाल ये था कि जहां-तहां कुकुरमुत्तों की तरह उग आये प्रकाशकों को किसी रेस्तरां में हासिल ओं डीमांड कई किस्म के परोंठों की तरह कई किस्म की स्क्रिप्ट चाहिए थी. अब इसमें दिक्कत ये थी कि किसी जेनुइन लेखक के नाम से किताब बाज़ार में आने पर उस लेखक का नाम चल निकलता था जो फिर आगे किसी और प्रकाशक के लिए लिखने जा सकता था. ऐसे में प्रकाशकों ने इसका तोड़ ये निकाला कि उन्होंने इस किस्म की किताबों को फर्जी नाम – जैसे केशव पंडित, विक्की आनंद, विकास गुप्ता, मनोज, समीर, राज, संजय, डार्लिंग – वैगरह नामों से निकाला. इस तरह की स्क्रिप्ट देने वाले लेखकों का चूंकि उस किताब की कामयाबी पर कोई हक नहीं रह जाता तो उन्होंने भी बकवास किस्म की स्क्रिप्ट देनी शुरू कर दीं जिसने आगे चलकर मूल रूप से इस पूरे धंधे को ही नुकसान पहुंचाया.
साहेबान – फिरंगी समाज में जहां ‘पल्प-फिक्शन’ की भी अपनी एक जगह है हमारे यहाँ हिंदी में छपते इस किस्म के जासूसी कथानकों को अपनी हकीर किस्मत के सदके उन्हें हमेशा ही बेहद घटिया, मोटे, नकारा रद्दी किस्म के कागज़ पर ही छापा गया आगे जिस पर फिर उनके कवर आर्ट – ज़्यादातर बन्दूक थामे एक शख्स की काइयां निगाहों का मरकज़ बनी कोई अर्धनग्न नारी बनाई जाती थी – ने इनकी समाज में एक ख़ास और नेगेटिव छवि उकेर दी. ऐसे में उनके इस किस्म के आउट-फिट, इनकी इस किस्म की फिजिकल प्रेसेंस ने उन्हें अपने समकालीन साहित्य की तुलना में न सिर्फ कमज़र्फ और वाहियात साबित करके रख किया बल्कि आगे इनके इसी अवतार की वजह से इन्हें हमेशा ही हिकारत की नज़रों से ही नवाज़ा गया. एक और जहां साहित्य के नाम पर आने वाली कहानियां साफ़ – सुथरे चिकने-चमकदार कागज़ पर अवतरित होती थीं वहीँ दूसरी ओर इन हिंदी जासूसी उपन्यासों को टकसाल का खोता ही माना जाता था. विलायत में प्रचलित वो मसल कि – unless the vessel is clean, whatever you pour into it turns sour – यहाँ वाकई सही साबित होती है.
वैसे ‘हिंदी-साहित्य’ के टैग के साथ आती किताबें अपनी तमाम झिलमिलाहट, अपनी तमाम चमचमाहट के बावजूद बिकती कितनी थी – इसे जाने के लिए किसी शोध की ज़रुरत नहीं. वहीँ दूसरी ओर हिंदी के ये जासूसी उपन्यास अपनी कम कीमत और सुलभ उपलब्धता के वजह से फ़टाफ़ट बिकते थे – और यही इनका आकर्षण था. ऐसा आकर्षण कि जिसके फंदे में फंसकर श्रीलाल शुक्ला – जो अब तक ‘राग-दरबारी’ लिख खूब स्थापित और खूब मंझे हुए साहित्यिक लेखक बन चुके थे – ने भी ‘आदमी का ज़हर लिखा’ और अपने ऊंचे नाम को खराब ही किया. वैसे इस सन्दर्भ में यहाँ एक विलायती नाम – क्रिस्टोफर कॉडवेल – का ज़िक्र करना भी माकूल रहेगा जो मार्क्सवादी विचारधारा के एक खूब प्रसिद्द, प्रचलित और स्थापित विचारक थे, ने भी अपने असली नाम – क्रिस्टोफर सेंट जॉन स्प्रिंग – ने कोई साथ जासूसी उपन्यास लिखे और खूब सफल रहे.
यानी हमारे यहाँ एक स्थापित साहित्यिक लेखक जब इस विधा में उतरा तो अपना बना बनाया नाम डुबा बैठा जबकि वहाँ विलायत में ठीक उलटा हुआ – वजह यही है कि हमारे यहाँ हिंदी में इस किस्म की विधा लेखन को कभी वो इज्ज़त ही नहीं मिली जिसकी वो सहज अधिकारी है.
बहरहाल वापिस मुद्दे की बात पर लौटते हैं.
हिंदी में जासूसी उपन्यासों की इस स्थिति के लिए और कई वजहों के अलावा एक सबसे बड़ी वजह ये भी थी कि इस भाषा के कई आत्म-मुग्ध आत्म-केन्द्रित खुर्राट खड़गधारी खलीफा साहित्यकार इन जासूसी उपन्यासों पर अपनी भड़ास कुछ यूँ निकालते थे कि मानो धड़ल्ले से से बिकते इन सस्ते सुलभ जासूसी उपन्यासों ने बिक्री हासिल कर खुद उनके नफे में कोई झपट्टामारी कर ली हो.
और नतीजतन – ‘अपना बिस्मिलाह, दूसरे का चिल्लम-चिल्ला’ – की तर्ज़ पर इनकी खूब बखिया उधेडी गई. ऐसे खडूस साहित्यकार – जो खुद इस विधा में अपना कोई मुकाम बना पाने में अक्षम थे – ने अपनी चिलम भरने को दूसरों का झोपड़ा जलाने पर उतर आने तक का काम किया. इन तथाकथित साहित्यकारों के नाम पर आती किताबें इस कदर मंहगी होती थी कि न तो आम पाठक इन्हें खरीद सकता था और अगर खरीद ले, और आगे एक जिद के तहत पढ़ भी ले, तो भी उसे समझ तो नहीं ही सकता था. साहित्य के इन पैतरेबाज़ महाचार्यों, मठाधीशों, प्रोपराईटरों को इस किस्म के जासूसी उपन्यासों के साथ आती कामयाबी और उसको आम जनता में हासिल तवज्जो हमेशा खलती रही और यूँ ख़ास इसी वजह से हिंदी साहित्य के ये तथाकथित हाकिम इस किस्म की विधा और इस किस्म की विधा में लिखते रहे लेखकों की काबिलियत, उनकी ज़ेहनियत पर सवाल दागते रहे.
बहरहाल वो किस्सा फिर कभी.
यहाँ इस लम्बे लेख को मैं ये लिखकर विराम देता हूँ कि बावजूद अपनी तमाम खूबियों – खामियों के ये विधा अभी भी सबसे ज़्यादा पसंद की जाने वाली कहानियां देती है. आज जब सामाजिक उपन्यास और उनके कथानकों को जहां गहरे दफना दिया गया लगता है वहीँ जासूसी कहानियां आज भी डीमांड में हैं और खूब पसंद की जाती हैं.
अगर आला मुल्कों के से सीख लें तो उम्मीद है कि जासूसी कहानियों का ये सिलसिला फिलहाल तो लंबा चलेगा.
आपका

डॉ. कँवल किशोर शर्मा

 

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