​पुस्तक समीक्षा- फ़लक (लघुकथा संग्रह) 

 

रचनाकार – वशिष्ठ मिश्रा, प्रवक्ता-हिंदी  (सेवानिवृत) – हिंदी, लखनऊ 

साहित्य के आचार्यों के मतानुसार वह भाषा और लेखनी अधिक सौंदर्यमयी लगती है जिसमें कम से कम शब्दों का प्रयोग करके अधिक से अधिक भाव व्यक्त किये जा सकते हों। ऐसा मेरा अनुभव रहा है कि हर प्रकार के श्रोता, उसी वक्ता को पसंद करते हैं जो कम शब्दों में अपनी बात कहकर भी विषय को पूर्णरूपेण समझाने में सक्षम होता है।

लघुकथाएं विश्व की हर भाषा और साहित्य में हमेशा से महत्त्वपूर्ण स्थान रखती हैं परन्तु कथा को अतिसीमित क्षेत्र में बाँधने की विवशता के कारण कथा लेखन की यह विधा अभी तक अपना समुचित सम्मान नही पा सकी है। पढ़ने में छोटी और सधी शब्दावली होने के कारण इन्हें पढ़ने का अलग आनंद होता है परन्तु शब्द संख्या की सीमा के परिणामस्वरूप इस विधा में घटनाप्रधान रचनाएं ही अधिक देखने को मिलती हैं तथा लेखक को भावनाओं और पात्रों का विस्तृत चित्रण करने में कठिनाई होती है।

दुःख की बात है कि इस विधा की रचनाएं अक्सर पत्रिकाओं में ‘फिलर्स’ के रूप में ही अधिक प्रयोग की जाती रही हैं।

मुझे यह कहने में संकोच नहीं है कि हिंदी में लघुकथाओं को इतनी सुव्यवस्थित सज्जा के साथ पुस्तकाकार रूप में देखने का यह मेरा पहला अनुभव है, जिसे मैं सुखद घोषित करूँगा। इसके लिए मैं अपने शिष्य गौरव निगम का आभारी हूँ जो इस पुस्तक में लेखक की भूमिका में भी हैंI

इस पुस्तक के लगभग सभी लेखक/लेखिकाओं का नाम मैंने पहली बार पढ़ा है। कई इस विधा के नवोदित लेखक/लेखिकाएं प्रतीत होते हैं, परंतु भावों और घटनाओं को प्रभावी ढंग से उकेरने में उन्होंने सफलता पायी है।अपर्णा अनेकवर्णा,  नेहा अग्रवाल निःशब्द, जीतेंद्र उपाध्याय, मीनाक्षी द्विवेदी, महविश रिजवी, ज्योत्स्ना सिंह,कनिष्ठा बैनर्जी, किरण वर्मा, ओम प्रकाश दास, प्रवीन झा, प्रदीपिका सारस्वत, प्रमिला काज़ी, ऋषिकान्त यादव, शिवांगी ठाकुर, गौरीकांत शर्मा, हेमंत देशमुख इत्यदि की रचनाएं प्रभावित करती हैं।

रश्मि प्रणय वागले, अनु रॉय, मुकेश कौशिक, कुमार गौरव, दीपिका लाल, कृष्ण कुमार रावत, विकास सारथी और वैभव चौहान की शब्दों पर बहुत अच्छी पकड़ है। यह भावों को तीव्रतम स्तर तक ले जाने में सक्षम हैं।

मंजू शर्मा, सुभाषचंद्र लखेरा और वसुधा गाडगिल की रचनाओं में अनुभव तथा ठहराव की झलक मिलती है। उपासना झा ने पद्य का प्रयोग गद्य के साथ विषयानुसार अच्छी तरह किया है। चितरंजन मित्तल की व्यंगात्मक शैली अच्छी है।

इस पुस्तक के संपादक ‘मंजीत ठाकुर’ ने निःसंदेह श्रेष्ठ कहानियों का चयन किया है जिसके लिए वह बधाई के पात्र हैं।

उन्होंने इस पुस्तक की रोचक भूमिका लिखी है और संपादक होने के उपरांत भी अपनी ही लघुकथा को सारिणी के अंत में स्थान देना उनकी विनम्रता ही दर्शाता है अन्यथा हिंदी के लेखन कार्य करने वाले

प्रकाशक/ संपादक बहुधा स्वयं को ही आगे के पृष्ठों में देखना पसंद करते हैं।

कुछ लघुकथाएं अत्याधिक छोटी होने के कारण पूर्ण रूप से अपना प्रभाव छोड़ने में सफल नहीं हो पाती हैं।

स्तरीय लघुकथाओं को पसंद करने वाले पाठकों को यह पुस्तक अवश्य पढ़नी चाहिए।

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2 comments on “​पुस्तक समीक्षा- फ़लक (लघुकथा संग्रह) 

  1. गहन अध्ययन के पश्चात लिखी गई है समीक्षा। निसन्देह इससे नवोदित लेखकों का उत्साहवर्धन होगा।

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