6 महीने !

रचनाकार- आशीष पैन्यूली, देहरादून- उत्तराखंड 

“क्या बात है डॉ साहब,प्लीज़ कुछ मत छुपाइए।बताइए किशोर को क्या हुआ है?”

“देखिए,आपके पति के हार्ट के चार चैंबर्स में से एक के कनेक्टिंग वॉल्व में छेद है।”

कुछ देर को खामोशी छा गई ।फिर डॉ साहब ने बात पूरी की-“दखिए हम अपनी तरफ से पूरी कोशिश करेंगे, पर…”

“पर क्या डॉक्टर?”

“आ…आई डोन्ट थिंक किशोर हैज़ मोर दैन सिक्स मंथ्स।”

डॉक्टर की बात सुन काव्या को लगा उसके पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई हो। वह मौन मूरत बन गई। रोई भी नहीं,आँसुओं के बहने के लिए भी होश में होना था,वह तो बदहवास हो गई थी। कुछ देर बाद उसने खुद को संभाला और डॉक्टर से बस इतना ही कहा – “डॉक्टर, आप प्लीज़ किशोर को उनकी इस बीमारी के बारे में कुछ मत बताइएगा।अगर मेरे पास छ: महीने भी हैं तो मैं इन छ: महीनों में किशोर को हर खुशी देना चाहती हूँ”

“ओके मिसेज़ शर्मा”

उस दिन से काव्या ने पति किशोर की सेवा में कोई कमी न छोङी। पहले जहाँ बङी कैजुअल सी रहती थी,अब अपने पति की हर छोटी-बङी जरूरत का ख्याल रखने लगी। किशोर के फेवरिट मालपूए जो पहले हफ्ते में एक दिन बनते थे,अब हर दिन बनने लगे।बनें भी क्यों न,वो छ: महीने में सात जन्मों को जीना चाहती थी। पति कभी किसी बात पर गुस्सा भी हो जाए तो भी उसके पास उत्तर में बस एक स्माइल होती थी जो किशोर को विस्मय में डाल देती थी,पर हर बार उसका गुस्सा शांत भी कर देती थी। इसी तरह दिन बीत रहे थे और देखते-देखते पांच महीने बीत गए। दिन-ब-दिन किशोर कमज़ोर होता जा रहा था,काव्या अबऔर केयरिंग होती जा रही थी…..पर परेशान भी। ऑफिस से लौटते हुए उसके हाथ गाङी की स्टेयरिंग पर स्थिर थे,पर मन में कई अनिश्चितताओं के बादल उमङ रहे थे,कई सवाल थे जो उसे परेशान किए जा रहे थे…संभावनाएं डरा रही थीं…उसके दिल में दफन राज़ और पास आती डेडलाइन उसे विचलित कर रही थी,इन ही उलझे हुए खयालों में डूबी हुई काव्या की नजर ही नहीं पङी स्पीड के कांटे पर,न ही सङक पर और न ही सामने से आते ट्रक पर जो पलक झपकते ही काव्या की कार को निगल गया।ऐक्सीडेंट इतना भयानक था कि मौके पर ही काव्या ने दम तोङ दिया।अपने पति की तारीख मुकर्रर होते ही उसने अपने जीवन  की अनिश्चितता से मुँह फेर लिया था।

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